शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * ३७७
पास उस पदके योग्य कोई ऐसी सामग्री तो है नहीं, जिससे मैं उस पदको ग्रहण कर सकूँ; क्योंकि न तो मेरे पास कोई महान् दिव्य रथ है, न उसके उपयुक्त सारथि है और न संग्राममें विजय दिलानेवाले वैसे धनुष-बाण ही हैं कि जिन्हें लेकर मैं मनोयोगपूर्वक संग्राममें उन प्रबल दैत्योंका वध कर सकूँ। यों कहकर वे चुप हो गये। परंतु शिवजीको शीघ्र प्रस्तुत होते न देखकर समस्त देवता, कश्यप आदि ऋषि अत्यन्त व्याकुल तथा दुःखी हो गये। तब भगवान् हरिने उनसे कहा।
भगवान् विष्णु बोले—‘‘देवो तथा मुनियो! तुमलोग क्यों दुःखी हो रहे हो? तुम्हें अपने सारे दुःखका परित्याग कर देना चाहिये। अब तुम सब लोग आदरपूर्वक मेरी बात सुनो। देवगण! तुम्हीं लोग विचार करो कि महान् पुरुषोंकी आराधना सुखसाध्य नहीं होती। मैंने ऐसा सुना है कि महदाराधनमें पहले महान् कष्ट झेलना पड़ता है। पीछे भक्तकी दृढ़ता देखकर इष्टदेव अवश्य प्रसन्न होते हैं। परंतु शिव तो समस्त गणोंके अध्यक्ष तथा परमेश्वर हैं। ये तो आशुतोष ही ठहरे। अतः पहले ‘ॐ’–का उच्चारण करके फिर ‘नमः’ का प्रयोग करे। फिर ‘शिवाय’ कहकर दो बार ‘शुभम्’ का उच्चारण करे। उसके बाद दो बार ‘कुरु’ का प्रयोग करके फिर ‘शिवाय नमः’ ‘ॐ’ जोड़ दे। (ऐसा करनेसे ‘ॐ नमः शिवाय शुभं शुभं कुरु कुरु शिवाय नमः ॐ’ यह मन्त्र बनता है।) बुद्धिविशारदो! यदि तुमलोग शिवकी प्रसन्नताके लिये इस मन्त्रका पुनः एक करोड़ जप करोगे तो शिवजी अवश्य तुम्हारा कार्य पूर्ण करेंगे।’’ मुने! प्रभावशाली श्रीहरिने जब यों कहा, तब सभी देवता पुनः शिवाराधनमें लग गये। तत्पश्चात् श्रीहरि भी देवों तथा मुनियोंके कार्यकी सिद्धिके हेतु शिवमें मन लगाकर विशेषरूपसे विधिपूर्वक जपमें तत्पर हो गये। मुनिश्रेष्ठ! इधर देवगण धैर्यसम्पन्न हो बारंबार ‘शिव’-‘शिव’ यों उच्चारण करते हुए एक करोड़ जप करके सामने खड़े हो गये। इसी समय स्वयं साक्षात् शिव पूर्वोक्त स्वरूप धारण करके प्रकट हो गये और यों कहने लगे।
श्रीशिवजी बोले—हरे! ब्रह्मन्! देवगण तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनियो! मैं तुमलोगोंके इस जपसे प्रसन्न हो गया हूँ, अतः अब तुमलोग अपना मनोवांछित वर माँग लो।
देवताओंने कहा—देवाधिदेव! कल्याणकर्ता जगदीश्वर! यदि आप हमपर प्रसन्न हैं तो देवोंकी विकलताका विचार करके शीघ्र ही त्रिपुरका संहार कर दीजिये। परमेश्वर! आप दीनबन्धु तथा कृपाकी खान हैं। आपने ही सदासे हम देवताओंकी बारंबार विपत्तियोंसे रक्षा की है, अतः इस समय भी आप हमारी रक्षा कीजिये।
सनत्कुमारजी कहते हैं—ब्रह्मन्! तब ब्रह्मा और विष्णुसहित देवोंकी वह बात सुनकर शिवजी मन-ही-मन प्रसन्न हुए और पुनः इस प्रकार बोले।
महेश्वरने कहा—हरे! ब्रह्मन्! देवगण! तथा मुनियो! अब त्रिपुरको नष्ट हुआ ही समझो। तुमलोग आदरपूर्वक मेरी बात सुनो (और उसके अनुसार कार्य करो)। मैंने पहले जिस दिव्य रथ, सारथि, धनुष और उत्तम बाणको अंगीकार किया