शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
शंखचूडको वर देनेके लिये लोकगुरु एवं ऐश्वर्यशाली ब्रह्मा शीघ्र ही वहाँ पधारे और उस दानवेन्द्रसे बोले—‘वर माँग!’ ब्रह्माजीको देखकर उसने अत्यन्त नम्रतासे उन्हें अभिवादन किया और फिर उत्तम वाणीसे उनकी स्तुति की। तत्पश्चात् उसने ब्रह्मासे वर माँगते हुए कहा—‘भगवन्! मैं देवताओंके लिये अजेय हो जाऊँ।’ तब ब्रह्माजी परम प्रसन्न होकर बोले—‘तथास्तु—ऐसा ही होगा।’ फिर उन्होंने शंखचूडको वह दिव्य श्रीकृष्णकवच प्रदान किया, जो जगत्के सम्पूर्ण मंगलोंका भी मंगल और सर्वत्र विजय प्रदान करनेवाला है। तदनन्तर ब्रह्माजीने उसे आज्ञा दी कि ‘तुम बदरीवनको जाओ। वहीं धर्मध्वजकी कन्या तुलसी सकामभावसे तपस्या कर रही है। तुम उसके साथ विवाह कर लो।’ यों कहकर ब्रह्माजी उसी क्षण उसके सामने ही तुरंत अन्तर्धान हो गये। तब तपः-सिद्ध शंखचूडने भी, जिसके सारे मनोरथ तपोबलसे पूर्ण हो चुके थे और मुखपर प्रसन्नता खेल रही थी, पुष्करमें ही उस जगत्के मंगलोंके भी मंगलस्वरूप कवचको गलेमें बाँध लिया और ब्रह्माके आज्ञानुसार वह तत्काल ही बदरिकाश्रमको चल पड़ा। वहाँ दानव शंखचूड सहसा उस स्थानपर जा पहुँचा जहाँ धर्मध्वजकी पुत्री तुलसी तप कर रही थी। सुन्दरी तुलसीका रूप अत्यन्त कमनीय और मनोहर था। वह उत्तम शीलसे सम्पन्न थी। उस सतीको देखकर शंखचूड उसके समीप ही ठहर गया और मधुर वाणीमें उससे बोला।
शंखचूडने कहा—सुन्दरी! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? तुम यहाँ चुपचाप बैठकर क्या कर रही हो? यह सारा रहस्य मुझे बतलाओ।
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! शंखचूडके ये सकाम वचन सुनकर तुलसीने उससे कहा।
तुलसी बोली—मैं धर्मध्वजकी तपस्विनी कन्या हूँ और यहाँ तपोवनमें तप कर रही हूँ। आप कौन हैं? सुखपूर्वक अपने अभीष्ट स्थानको चले जाइये; क्योंकि नारीजाति ब्रह्मा आदिको भी मोहमें डाल देनेवाली होती है। यह विषतुल्य, निन्दनीय, दोष उत्पन्न करनेवाली, मायारूपिणी तथा विचारशीलोंको भी शृंखलाके समान जकड़ लेनेवाली होती है।
सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे! तुलसी जब इस प्रकार रसभरी बातें कहकर चुप हो गयी, तब उसे मुसकराती देखकर शंखचूडने भी कहना आरम्भ किया।
शंखचूड बोला—देवि! तुमने जो बात कही है, वह सारी-की-सारी मिथ्या हो, ऐसी बात नहीं है। उसमें कुछ सत्य है और कुछ
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