शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 417, कुल 850 में से
संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * ४०३
त्यागकर दिव्य देह धारण कर लो और लक्ष्मीके समान होकर नित्य श्रीहरिके साथ (वैकुण्ठमें) विहार करती रहो। तुम्हारा यह शरीर, जिसे तुम छोड़ दोगी, नदीके रूपमें परिवर्तित हो जायगा। वह नदी भारतवर्षमें पुण्यरूपा गण्डकीके नामसे प्रसिद्ध होगी। महादेवि! कुछ कालके पश्चात् मेरे वरके प्रभावसे देवपूजन-सामग्रीमें तुलसीका प्रधान स्थान हो जायगा। सुन्दरी! तुम स्वर्गलोकमें, मृत्युलोकमें तथा पातालमें सदा श्रीहरिके निकट ही निवास करोगी और पुष्पोंमें श्रेष्ठ तुलसीका वृक्ष हो जाओगी। तुम वैकुण्ठमें दिव्यरूपधारिणी वृक्षाधिष्ठात्री देवी बनकर सदा एकान्तमें श्रीहरिके साथ क्रीडा करोगी। उधर भारतवर्षमें जो नदियोंकी अधिष्ठात्री देवी होगी, वह परम पुण्य प्रदान करनेवाली होगी और श्रीहरिके अंशभूत लवणसागरकी पत्नी बनेगी। तथा श्रीहरि भी तुम्हारे शापवश पत्थरका रूप धारण करके भारतमें गण्डकी नदीके जलके निकट निवास करेंगे। वहाँ तीखी दाढ़ोंवाले करोड़ों भयंकर कीड़े उस पत्थरको काटकर उसके मध्यमें चक्रका आकार बनायेंगे। उसके भेदसे वह अत्यन्त पुण्य प्रदान करनेवाली शालग्रामशिला कहलायेगी और चक्रके भेदसे उसका लक्ष्मीनारायण आदि भी नाम होगा। विष्णुकी शालग्रामशिला और वृक्षस्वरूपिणी तुलसीका समागम सदा अनुकूल तथा बहुत प्रकारके पुण्योंकी वृद्धि करनेवाला होगा। भद्रे! जो शालग्रामशिलाके ऊपरसे तुलसीपत्रको दूर करेगा, उसे जन्मान्तरमें स्त्रीवियोगकी प्राप्ति होगी तथा जो शंखको दूर करके तुलसीपत्रको हटायेगा, वह भी भार्याहीन होगा और सात जन्मोंतक रोगी बना रहेगा। जो महाज्ञानी पुरुष शालग्रामशिला, तुलसी और शंखको एकत्र रखकर उनकी रक्षा करता है, वह श्रीहरिका प्यारा होता है।
सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी ! इस प्रकार कहकर शंकरजीने उस समय शालग्रामशिला और तुलसीके परम पुण्य-दायक माहात्म्यका वर्णन किया। तत्पश्चात् वे श्रीहरिको तथा तुलसीको आनन्दित करके अन्तर्धान हो गये। इस प्रकार सदा सत्पुरुषोंका कल्याण करनेवाले शम्भु अपने स्थानको चले गये। इधर शम्भुका कथन सुनकर तुलसीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने अपने उस शरीरका परित्याग करके दिव्य रूप धारण कर लिया। तब कमलापति विष्णु उसे साथ लेकर वैकुण्ठको चले गये। उसके छोड़े हुए शरीरसे गण्डकी नदी प्रकट हो गयी और भगवान् अच्युत भी उसके तटपर मनुष्योंको पुण्यप्रदान करनेवाली शिलाके रूपमें परिणत हो गये। मुने! उसमें कीड़े अनेक प्रकारके छिद्र बनाते रहते हैं। उनमें जो शिलाएँ गण्डकीके जलमें गिरती हैं, वे परम पुण्यप्रद होती हैं और जो स्थलपर ही रह जाती हैं, उन्हें पिंगला कहा जाता है और वे प्राणियोंके लिये संतापकारक होती हैं। व्यासजी! इस प्रकार तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने शम्भुका सारा चरित, जो पुण्यप्रदान तथा मनुष्योंकी सारी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है, तुम्हें सुना दिया। यह पुण्य आख्यान, जो विष्णुके माहात्म्यसे संयुक्त तथा भोग और मोक्षका प्रदाता है, तुमसे वर्णन कर दिया; अब और क्या सुनना चाहते हो ?
(अध्याय ४१)