शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 439, कुल 850 में से
संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * ४२५
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनिवर! भृगुनन्दन शुक्रने इस प्रकार अष्टमूर्त्यष्टक-स्तोत्रद्वारा शिवजीका स्तवन करके भूमिपर मस्तक रखकर उन्हें बारंबार प्रणाम किया। जब अमित तेजस्वी भार्गवने महादेवकी इस प्रकार स्तुति की, तब शिवजीने चरणोंमें पड़े हुए उन द्विजवरको अपनी दोनों भुजाओंसे पकड़कर उठा लिया और परम प्रेमपूर्वक मेघगर्जनकी-सी गम्भीर एवं मधुर वाणीमें कहा। उस समय शंकरजीके दाँतोंकी चमकसे सारी दिशाएँ प्रकाशित हो उठी थीं।
महादेवजी बोले—विप्रवर कवे! तुम मेरे पावन भक्त हो। तात! तुम्हारे इस उग्र तपसे, उत्तम आचरणसे, लिंगस्थापनजन्य पुण्यसे, लिंगकी आराधना करनेसे, चित्तका उपहार प्रदान करनेसे, पवित्र अटलभावसे, अविमुक्त महाक्षेत्र काशीमें पावन आचरण करनेसे मैं तुम्हें पुत्ररूपसे देखता हूँ; अतः तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है। तुम अपने इसी शरीरसे मेरी उदरदरीमें प्रवेश करोगे और मेरे श्रेष्ठ इन्द्रियमार्गसे निकलकर पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण करोगे। महाशुचे! मेरे पास जो मृतसंजीवनी नामकी निर्मल विद्या है, जिसका मैंने ही अपने महान् तपोबलसे निर्माण किया है, उस महामन्त्ररूपा विद्याको आज मैं तुम्हें प्रदान करूँगा; क्योंकि तुम पवित्र तपकी निधि हो, अतः तुममें उस विद्याको धारण करनेकी योग्यता वर्तमान है। तुम नियमपूर्वक जिस-जिसके उद्देश्यसे विद्येश्वरकी इस श्रेष्ठ विद्याका प्रयोग करोगे, वह निश्चय ही जीवित हो जायगा—यह सर्वथा सत्य है। तुम आकाशमें अत्यन्त दीप्तिमान् तारारूपसे स्थित होओगे। तुम्हारा तेज सूर्य और अग्निके तेजका भी अतिक्रमण कर जायगा। तुम ग्रहोंमें प्रधान माने जाओगे। जो स्त्री अथवा पुरुष तुम्हारे सम्मुख रहनेपर यात्रा करेंगे, उनका सारा कार्य तुम्हारी दृष्टि
त्वं पावने पथि सदा गतिरप्युपास्यः कस्तवां विना भुवनजीवन जीवतीह।
स्तब्धप्रभञ्जनविवर्धितसर्वजन्तो संतोषिताहिकुल सर्वग वै नमस्ते॥
विश्वैकपावक नतावक पावकैक शक्ते ऋते मृतवतामृतदिव्यकार्यम्।
प्राणिष्यदो जगदहो जगदान्तरात्मंस्त्वं पावकः प्रतिपदं शमदो नमस्ते॥
पानीयरूप परमेश जगत्पवित्र चित्रातिचित्रसुचरित्रकरोऽसि नूनम्।
विश्वं पवित्रममलं किल विश्वनाथ पानीयगाहनत एतदतो नतोऽस्मि॥
आकाशरूपबहिरन्तरुतावकाशादानाद् विकस्वरमिहेश्वर विश्वमेतत्।
त्वत्तस्सदा सदय संश्वसिति स्वभावात् संकोचमेति भवतोऽस्मि नतस्ततस्त्वाम्॥
विश्वम्भरात्मक बिभर्षि विभोऽत्र विश्वं को विश्वनाथ भवतोऽन्यतमस्तमोऽरिः।
स त्वं विनाशय तमो मम चाहिभूष स्तव्यात्परः परपरं प्रणतस्ततस्त्वाम्॥
आत्मस्वरूप तव रूपपरम्पराभिराभिस्ततं हर चराचररूपमेतत्।
सर्वान्तरात्मनिलय प्रतिरूपरूप नित्यं नतोऽस्मि परमात्मजनोऽष्टमूर्ते॥
इत्यष्टमूर्तिभिरिमाभिरबन्धबन्धो युक्तः करोषि खलु विश्वजनीनमूर्ते।
एतत्ततं सुविततं प्रणतप्रणीत सर्वार्थसार्थपरमार्थ ततो नतोऽस्मि॥
(शि० पु० रु० सं० युद्धखण्ड ५०।२४-३२)