शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 444, कुल 850 में से
संदर्भ में पढ़ें४३० * संक्षिप्त शिवपुराण *
आज्ञा दी कि इसे मार डालो। सेनाने अनिरुद्धपर आक्रमण किया। तब अनिरुद्धने बात-की-बातमें दस हजार सैनिकोंको कालके हवाले कर दिया। फिर तो असंख्य सेना-पर-सेना आने लगी और अनिरुद्ध उन्हें कालका ग्रास बनाने लगे। तदनन्तर उन्होंने बाणासुरका वध करनेके लिये एक शक्ति हाथमें ली, जो कालाग्निके समान भयंकर थी। फिर उसीसे रथकी बैठकमें बैठे हुए बाणासुरपर प्रहार किया। उसकी गहरी चोट खाकर वीरवर बाण उसी क्षण घोड़ोंसहित वहीं अन्तर्धान हो गया। फिर महावीर बलिपुत्र बाणासुरने, जो महान् बलसम्पन्न तथा शिवभक्त था, छलपूर्वक नागपाशसे अनिरुद्धको बाँध लिया। इस प्रकार उन्हें बाँधकर और पिंजरेमें कैद करके वह युद्धसे उपराम हो गया। तत्पश्चात् बाण कुपित होकर महाबली सूतपुत्रसे बोला।
बाणासुरने कहा—सूतपुत्र! घास-फूससे ढके हुए अगाध कुएँमें ढकेलकर इस पापीको मार डाल। अधिक क्या कहूँ, इसे सर्वथा मार ही डालना चाहिये।
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! उसकी यह बात सुनकर उत्तम मन्त्रियोंमें श्रेष्ठ धर्मबुद्धि निशाचर कुम्भाण्डने बाणासुरसे कहा।
कुम्भाण्ड बोला—देव! थोड़ा विचार तो कीजिये। मेरी समझसे तो यह कर्म करना उचित नहीं प्रतीत होता; क्योंकि इसके मारे जानेपर अपना आत्मा ही आहत हो जायगा। पराक्रममें तो यह विष्णुके समान दीख रहा है। जान पड़ता है, आपपर कुपित होकर चन्द्रचूड़ने अपने उत्तम तेजसे इसे बढ़ा दिया है। साहसमें यह शशिमौलिकी समानता कर रहा है; क्योंकि इस अवस्थाको पहुँच जानेपर भी यह पुरुषार्थपर ही डटा हुआ है। यह ऐसा बली है कि यद्यपि नाग इसे बलपूर्वक डँस रहे हैं, तथापि यह हमलोगोंको तृणवत् ही समझ रहा है।
सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! दानव कुम्भाण्ड राजनीतिके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ था। वह बाणसे ऐसा कहकर फिर अनिरुद्धसे कहने लगा।
कुम्भाण्डने कहा—'नराधम! अब तू वीरवर दैत्यराजकी स्तुति कर और दीन वाणीसे 'मैं हार गया' यों बारंबार कहकर उन्हें हाथ जोड़कर नमस्कार कर। ऐसा करनेपर ही तू मुक्त हो सकता है, अन्यथा तुझे बन्धन आदिका कष्ट भोगना पड़ेगा।' उसकी बात सुनकर अनिरुद्ध उत्तर देते हुए बोले।
अनिरुद्धने कहा—दुराचारी निशाचर! तुझे क्षत्रिय-धर्मका ज्ञान नहीं है। अरे! शूरवीरके लिये दीनता दिखाना और युद्धसे मुख मोड़कर भागना मरणसे भी बढ़कर कष्टदायक होता है। मेरे विचारसे तो विरुद्धाचरण काँटेकी तरह चुभनेवाला होता है। वीरमानी क्षत्रियके लिये रणभूमिमें सदा सम्मुख लड़ते हुए मरना ही श्रेयस्कर है, भूमिपर पड़कर हाथ जोड़े हुए दीनकी तरह मरना कदापि नहीं।*
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! इस
* क्षत्रियस्य रणे श्रेयो मरणं सम्मुखे सदा। न वीरमानिनी भूमौ दीनस्येव कृताञ्जलेः॥
(शि० पु० रु० सं० युद्धखण्ड ५३। ३५)