शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* रुद्रसंहिता * ४३३
भीषण युद्ध करने लगा। इस प्रकार उन दोनोंमें चिरकालतक बड़ा घोर संग्राम होता रहा; क्योंकि विष्णुके अवतार श्रीकृष्ण शिवरूप ही थे और उधर बलवान् बाणासुर उत्तम शिवभक्त था। मुनीश्वर! तदनन्तर वीर्यवान् श्रीकृष्ण, जिन्हें शिवकी आज्ञासे बल प्राप्त हो चुका था, चिरकालतक बाणके साथ यों युद्ध करके अत्यन्त कुपित हो उठे। तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने शम्भुके आदेशासे शीघ्र ही सुदर्शन चक्रद्वारा बाणकी बहुत-सी भुजाओंको काट डाला। अन्तमें उसकी अत्यन्त सुन्दर चार भुजाएँ ही अवशेष रह गयीं और शंकरकी कृपासे शीघ्र ही उसकी व्यथा भी मिट गयी। जब बाणकी स्मृति लुप्त हो गयी और वीरभावको प्राप्त हुए श्रीकृष्ण उसका सिर काट लेनेके लिये उद्यत हुए, तब शंकरजी मोहनिद्राको त्यागकर उठ खड़े हुए और बोले।
रुद्रने कहा—देवकीनन्दन! आप तो सदासे मेरी आज्ञाका पालन करते आये हैं। भगवान्! मैंने पहले आपको जिस कामके लिये आज्ञा दी थी, वह तो आपने पूरा कर दिया। अब बाणका शिरश्छेदन मत कीजिये और सुदर्शन चक्रको लौटा लीजिये। मेरी आज्ञासे यह चक्र सदा मेरे भक्तोंपर अमोघ रहा है। गोविन्द! मैंने पहले ही आपको युद्धमें अनिवार्य चक्र और जय प्रदान की थी, अब आप इस युद्धसे निवृत्त हो जाइये। लक्ष्मीश! पूर्वकालमें भी तो आपने मेरी आज्ञाके बिना दधीच, वीरवर रावण और तारकाक्ष आदिके पुरोंपर चक्रका प्रयोग नहीं किया था। जनार्दन! आप तो योगीश्वर, साक्षात् परमात्मा और सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत रहनेवाले हैं। आप स्वयं ही अपने मनसे विचार कीजिये। मैंने इसे वर दे रखा है कि तुझे मृत्युका भय नहीं होगा। मेरा वह वचन सदा सत्य होना चाहिये। मैं आपपर परम प्रसन्न हूँ। हरे! बहुत दिन पूर्व यह गर्वसे भरकर उन्मत्त हो उठा और अपने-आपको भूल गया था। तब अपनी भुजाएँ खुजलाता हुआ यह मेरे पास पहुँचा और बोला—‘मेरे साथ युद्ध कीजिये।’ तब मैंने इसे शाप देते हुए कहा—‘थोड़े ही समयमें तेरी भुजाओंका छेदन करनेवाला आयेगा। तब तेरा सारा गर्व गल जायगा।’ (बाणकी ओर देखकर) कहा—‘मेरी ही आज्ञासे तेरी भुजाओंको काटनेवाले ये श्रीहरि आये हैं।’ (फिर श्रीकृष्णसे) ‘अब आप युद्ध बंद कर दीजिये और वर-वधूको साथ ले अपने घरको लौट जाइये।’ यों कहकर महेश्वरने उन दोनोंमें मित्रता करा दी और उनकी आज्ञा ले वे पुत्रों और गणोंके साथ अपने निवासस्थानको चले गये।
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! शम्भुका कथन सुनकर अक्षत शरीरवाले