शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 452, कुल 850 में से
संदर्भ में पढ़ें४३८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
नहीं। तात! तब पार्वती अपने स्वामी महाकौतुकी परमेश्वर शंकरके उस नेत्रसंकेतको समझ गयीं। तदनन्तर सर्वज्ञ शिवकी अर्धांगिनी पार्वतीके उस संकेतको समझकर उसी गेंदसे एक साथ ही उन दोनोंपर चोट की। तब महादेवीकी गेंदसे आहत होकर वे दोनों महाबली दुष्ट दैत्य चक्कर काटते हुए उसी प्रकार भूतलपर गिर पड़े, जैसे वायुके झोंकेसे चंचल होकर दो पके हुए ताड़के फल अपनी डंठलसे टूटकर गिर पड़ते हैं अथवा जैसे वज्रके आघातसे महागिरिके दो शिखर ढह जाते हैं। इस प्रकार अकार्य करनेके लिये उद्यत उन दोनों महादैत्योंको धराशायी करके वह गेंद लिंगरूपमें परिणत हो गया। समस्त दुष्टोंका निवारण करनेवाला वह लिंग कन्दुकेश्वरके नामसे विख्यात हुआ और ज्येष्ठेश्वरके समीप स्थित हो गया। काशीमें स्थित कन्दुकेश्वरलिंग दुष्टोंका विनाशक, भोग-मोक्षका प्रदाता और सर्वदा सत्पुरुषों-की समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। जो मनुष्य इस अनुपम आख्यानको हर्षपूर्वक सुनता, सुनाता अथवा पढ़ता है, उसे भयका दुःख कहाँ। वह इस लोकमें नाना प्रकारके सम्पूर्ण उत्तमोत्तम सुखोंको भोगकर अन्तमें देवदुर्लभ दिव्य गतिको प्राप्त कर लेता है।
ब्रह्माजी कहते हैं—मुनिसत्तम! मैंने तुमसे रुद्रसंहिताके अन्तर्गत इस युद्ध-खण्डका वर्णन कर दिया। यह खण्ड सम्पूर्ण मनोरथोंका फल प्रदान करनेवाला है। इस प्रकार मैंने पूरी-की-पूरी रुद्र-संहिताका वर्णन कर दिया। यह शिवजीको सदा परम प्रिय है और भुक्ति-मुक्तिरूप फल प्रदान करनेवाली है।
सूतजी कहते हैं—इस प्रकार शिवानुगामी ब्रह्मपुत्र नारद शंकरके उत्तम यशको तथा शिव-शतनामको सुनकर कृतार्थ हो गये। यों मैंने सम्पूर्ण चरित्रोंमें प्रधान तथा कल्याणकारक यह ब्रह्मा और नारदका संवाद पूर्णरूपसे कह दिया, अब तुम्हारी और क्या सुननेकी इच्छा है?
(अध्याय ५९)
~~ ० ~~
॥ रुद्रसंहिताका युद्धखण्ड सम्पूर्ण ॥
~~ ० ~~
॥ रुद्रसंहिता समाप्त ॥
~~ ० ~~