भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 472

४५८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

गहरी मूर्च्छाके वशीभूत हो गये। उधर शुचिष्मती भी दुःखसे पीड़ित हो अत्यन्त ऊँचे स्वरसे हाहाकार करती हुई ढाढ़ मारकर रो पड़ी, उसकी सारी इन्द्रियाँ अत्यन्त व्याकुल हो उठीं। तब पत्नीके आर्तनादको सुनकर विश्वानर भी मूर्च्छा त्यागकर उठ बैठे और 'ऐं! यह क्या है? क्या हुआ?' यों उच्चस्वरसे बोलते हुए कहने लगे—'गृहपति! जो मेरा बाहर विचरनेवाला प्राण, मेरी सारी इन्द्रियोंका स्वामी तथा मेरे अन्तरात्मामें निवास करनेवाला है, कहाँ है?' तब माता-पिताको इस प्रकार अत्यन्त शोकग्रस्त देखकर शंकरके अंशसे उत्पन्न हुआ वह बालक गृहपति मुसकराकर बोला।

गृहपतिने कहा—माताजी तथा पिताजी! बताइये इस समय आपलोगोंके रोनेका क्या कारण है? किसलिये आपलोग फूट-फूटकर रो रहे हैं? कहाँसे ऐसा भय आपलोगोंको प्राप्त हुआ है? यदि मैं आपकी चरणरेणुओंसे अपने शरीरकी रक्षा कर लूँ तो मुझपर काल भी अपना प्रभाव नहीं डाल सकता; फिर इस तुच्छ, चंचल एवं अल्प बलवाली मृत्युकी तो बात ही क्या है। माता-पिताजी! अब आपलोग मेरी प्रतिज्ञा सुनिये—'यदि मैं आपलोगोंका पुत्र हूँ तो ऐसा प्रयत्न करूँगा जिससे मृत्यु भी भयभीत हो जायगी। मैं सत्पुरुषोंको सब कुछ दे डालनेवाले सर्वज्ञ मृत्युंजयकी भलीभाँति आराधना करके महाकालको भी जीत लूँगा—यह मैं आप लोगोंसे बिलकुल सत्य कह रहा हूँ।'

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! तब वे द्विजदम्पति, जो शोकसे संतप्त हो रहे थे, गृहपतिके ऐसे वचन, जो अकालमें हुई अमृतकी घनघोर वृष्टिके समान थे, सुनकर संतापरहित हो कहने लगे—'बेटा! तू उन शिवकी शरणमें जा, जो ब्रह्मा आदिके भी कर्ता, मेघवाहन, अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले और विश्वकी रक्षामणि हैं।'

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! माता-पिताकी आज्ञा पाकर गृहपतिने उनके चरणोंमें प्रणाम किया। फिर उनकी प्रदक्षिणा करके और उन्हें बहुत तरहसे आश्वासन दे वे वहाँसे चल पड़े और उस काशीपुरीमें जा पहुँचे, जो ब्रह्मा और नारायण आदि देवोंके लिये ( भी ) दुष्प्राप्य, महाप्रलयके संतापका विनाश करनेवाली और विश्वनाथद्वारा सुरक्षित थी तथा जो कण्ठप्रदेशमें हारकी तरह पड़ी हुई गंगासे सुशोभित तथा विचित्र गुणशालिनी हरपत्नी गिरिजासे विभूषित थी। वहाँ पहुँचकर वे विप्रवर पहले मणिकर्णिकापर गये। वहाँ उन्होंने विधिपूर्वक स्नान करके भगवान् विश्वनाथका दर्शन किया। फिर बुद्धिमान् गृहपतिने परमानन्दमग्न हो त्रिलोकीके प्राणियोंकी प्राणरक्षा करनेवाले शिवको प्रणाम किया। उस समय उनकी अंजलि बँधी थी और सिर झुका हुआ था। वे बारंबार उस शिवलिंगकी ओर देखकर हृदयमें हर्षित हो रहे थे ( और यह सोच रहे थे कि ) यह लिंग निस्संदेह स्पष्टरूपसे आनन्दकन्द ही है। ( वे कहने लगे— ) अहो! आज मुझे जो सर्वव्यापी श्रीमान् विश्वनाथका दर्शन प्राप्त हुआ, इसलिये इस चराचर त्रिलोकीमें मुझसे बढ़कर धन्यवादका पात्र दूसरा कोई नहीं है। जान पड़ता है, मेरा भाग्योदय होनेसे ही उन दिनोंमें