भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 474, कुल 850 में से

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पृष्ठ 474

४६० * संक्षिप्त शिवपुराण *

कहनेमें समर्थ न हो सके, तब शिवजी मुसकराकर बोले।

ईश्वरने कहा—गृहपते! जान पड़ता है, तुम वज्रधारी इन्द्रसे डर गये हो। वत्स! तुम भयभीत मत होओ; क्योंकि मेरे भक्तपर इन्द्र और वज्रकी कौन कहे, यमराज भी अपना प्रभाव नहीं डाल सकते। यह तो मैंने तुम्हारी परीक्षा ली है और मैंने ही तुम्हें इन्द्ररूप धारण करके डराया है। भद्र! अब मैं तुम्हें वर देता हूँ—आजसे तुम अग्निपदके भागी होओगे। तुम समस्त देवताओंके लिये वरदाता बनोगे। अग्ने! तुम समस्त प्राणियोंके अंदर जठराग्निरूपसे विचरण करोगे। तुम्हें दिक्पालरूपसे धर्मराज और इन्द्रके मध्यमें राज्यकी प्राप्ति होगी। तुम्हारे द्वारा स्थापित यह शिवलिंग तुम्हारे नामपर 'अग्नीश्वर' नामसे प्रसिद्ध होगा। यह सब प्रकारके तेजोंकी वृद्धि करनेवाला होगा। जो लोग इस अग्नीश्वर-लिंगके भक्त होंगे, उन्हें बिजली और अग्निका भय नहीं रह जायगा, अग्निमान्द्य नामक रोग नहीं होगा और न कभी उनकी अकालमृत्यु ही होगी। काशीपुरीमें स्थित सम्पूर्ण समृद्धियोंके प्रदाता अग्नीश्वरकी भलीभाँति अर्चना करनेवाला भक्त यदि प्रारब्धवश किसी अन्य स्थानमें भी मृत्युको प्राप्त होगा तो भी वह वह्निलोकमें प्रतिष्ठित होगा।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! यों कहकर शिवजीने गृहपतिके बन्धुओंको बुलाकर उनके माता-पिताके सामने उस अग्निका दिक्पतिपदपर अभिषेक कर दिया और स्वयं उसी लिंगमें समा गये। तात! इस प्रकार मैंने तुमसे परमात्मा शंकरके गृहपति नामक अग्न्यवतारका, जो दुष्टोंको पीड़ित करनेवाला है, वर्णन कर दिया। जो सुदृढ़ पराक्रमी जितेन्द्रिय पुरुष अथवा सत्त्वसम्पन्न स्त्रियाँ अग्निप्रवेश कर जाती हैं, वे सब-के-सब अग्निसरीखे तेजस्वी होते हैं। इसी प्रकार जो ब्राह्मण अग्निहोत्र-परायण, ब्रह्मचारी तथा पंचाग्निका सेवन करनेवाले हैं, वे अग्निके समान वर्चस्वी होकर अग्निलोकमें विचरते हैं। जो शीतकालमें शीतनिवारणके निमित्त बोझ-की-बोझ लकड़ियाँ दान करता है अथवा जो अग्निकी इष्टि करता है, वह अग्निके संनिकट निवास करता है। जो श्रद्धापूर्वक किसी अनाथ मृतकका अग्निसंस्कार कर देता है अथवा स्वयं शक्ति न होनेपर दूसरेको प्रेरित करता है, वह अग्निलोकमें प्रशंसित होता है। द्विजातियोंके लिये परम कल्याणकारक एक अग्नि ही है। वही निश्चितरूपसे गुरु, देवता, व्रत, तीर्थ अर्थात् सब कुछ है। जितनी अपावन वस्तुएँ हैं, वे सब अग्निका संसर्ग

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