भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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४६६ * संक्षिप्त शिवपुराण *


गये। तब उन्होंने अपनी पत्नी सुवर्चाको अपने आश्रमसे अन्यत्र भेज दिया। तत्पश्चात् देवताओंसहित देवराज इन्द्र, जो स्वार्थ-साधनमें बड़े दक्ष हैं, अर्थशास्त्रका आश्रय लेकर मुनिवरसे बोले।

इन्द्रने कहा—‘मुने! आप महान् शिवभक्त, दाता तथा शरणागतरक्षक हैं; इसीलिये हम सभी देवता तथा देवर्षि त्वष्टाद्वारा अपमानित होनेके कारण आपकी शरणमें आये हैं। विप्रवर! आप अपनी वज्रमयी अस्थियाँ हमें प्रदान कीजिये; क्योंकि आपकी हड्डीसे वज्रका निर्माण करके मैं उस देवद्रोहीका वध करूँगा।’ इन्द्रके यों कहनेपर परोपकार-परायण दधीचि मुनिने अपने स्वामी शिवका ध्यान करके अपना शरीर छोड़ दिया। उनके समस्त बन्धन नष्ट हो चुके थे, अतः वे तुरंत ही ब्रह्मलोकको चले गये। उस समय वहाँ पुष्पोंकी वर्षा होने लगी और सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये। तदनन्तर इन्द्रने शीघ्र ही सुरभि गौको बुलाकर उस शरीरको चटवाया और उन हड्डियोंसे अस्त्र-निर्माण करनेके लिये विश्वकर्माको आदेश दिया। तब इन्द्रकी आज्ञा पाकर विश्वकर्माने शिवजीके तेजसे सुदृढ़ हुई मुनिकी वज्रमयी हड्डियोंसे सम्पूर्ण अस्त्रोंकी कल्पना की। उनके रीढ़की हड्डीसे वज्र और ब्रह्मशिर नामक बाण बनाया तथा अन्य अस्थियोंसे अन्यान्य बहुत-से अस्त्रोंका निर्माण किया। तब शिवजीके तेजसे उत्कर्षको प्राप्त हुए इन्द्रने उस वज्रको लेकर क्रोधपूर्वक वृत्रासुरपर आक्रमण किया, ठीक उसी तरह जैसे रुद्रने यमराजपर धावा किया था। फिर तो कवच आदिसे भलीभाँति सुरक्षित हुए इन्द्रने तुरंत ही पराक्रम प्रकट करके उस वज्रद्वारा वृत्रासुरके पर्वतशिखर-सरीखे सिरको काट गिराया। तात! उस समय स्वर्गवासियोंने महान् विजयोत्सव मनाया, इन्द्रपर पुष्पोंकी वृष्टि होने लगी और सभी देवता उनकी स्तुति करने लगे। तदनन्तर महान् आत्मबलसे सम्पन्न दधीचि मुनिकी पतिव्रता पत्नी सुवर्चा पतिके आज्ञानुसार अपने आश्रमके भीतर गयी। वहाँ देवताओंके लिये पतिको मरा हुआ जानकर वह देवताओंको शाप देते हुए बोली।

सुवर्चाने कहा—‘अहो! इन्द्रसहित ये सभी देवता बड़े दुष्ट हैं और अपना कार्य सिद्ध करनेमें निपुण, मूर्ख तथा लोभी हैं; इसलिये ये सब-के-सब आजसे मेरे शापसे पशु हो जायँ।’ इस प्रकार उस तपस्वी मुनिपत्नी सुवर्चाने उन इन्द्र आदि समस्त देवताओंको शाप दे दिया। तत्पश्चात् उस पतिव्रताने पतिलोकमें जानेका विचार किया। फिर तो मनस्विनी सुवर्चाने परम पवित्र लकड़ियोंद्वारा एक चिता तैयार की। उसी समय शंकरजीकी प्रेरणासे सुखदायिनी आकाशवाणी हुई, वह उस मुनिपत्नी सुवर्चाको आश्वासन देती हुई बोली।

आकाशवाणीने कहा—प्राज्ञे! ऐसा साहस मत करो, मेरी उत्तम बात सुनो। देवि! तुम्हारे उदरमें मुनिका तेज वर्तमान है, तुम उसे यत्नपूर्वक उत्पन्न करो। पीछे तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करना; क्योंकि शास्त्रका ऐसा आदेश है कि गर्भवतीको अपना शरीर नहीं जलाना चाहिये अर्थात् सती नहीं होना चाहिये।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुनीश्वर! यों कहकर वह आकाशवाणी उपराम हो गयी।