भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 498, कुल 850 में से

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पृष्ठ 498

४८४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

गुप्तचर भयभीत हो गये। वे सोचने लगे— यह यहाँ कब आ गया? पुनः उन्होंने ऐसा विचार किया कि यह घटना इन्द्रको बतला देनी चाहिये। ऐसा सोचकर वे तत्काल ही इन्द्रके समीप गये।

गुप्तचरोंने कहा—देवेश! वनमें एक पुरुष तप कर रहा है; परंतु हमें पता नहीं कि वह देवता है, ऋषि है, सूर्य है अथवा अग्नि है। उसीके तेजसे संतप्त होकर हम आपके संनिकट आये हैं। हमने उसका चरित्र भी आपसे निवेदित कर दिया। अब आप जैसा उचित समझें, वैसा करें।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! उन गुप्तचरोंके यों कहनेपर इन्द्रको अपने पुत्र अर्जुनका सारा मनोरथ ज्ञात हो गया। तब वे पर्वतरक्षकोंको विदा करके स्वयं वहाँ जानेका विचार करने लगे। विप्रवर! इन्द्र अर्जुनकी परीक्षा करनेके लिये वृद्ध ब्रह्मचारी ब्राह्मणका वेष बनाकर वहाँ पहुँचे। उस समय उन्हें आया हुआ देखकर पाण्डुपुत्र अर्जुनने उनकी पूजा की और फिर उनकी स्तुति करके आगे खड़े हो पूछने लगे—'ब्रह्मन्! बताइये, इस समय कहाँसे आपका शुभागमन हुआ है?' इसपर ब्राह्मणवेषधारी इन्द्रने अर्जुनको ऐसे वचन कहे, जिससे वह तपसे डिग जाय; पर जब अर्जुनको दृढ़निश्चय देखा, तब अपने स्वरूपमें प्रकट होकर इन्द्रने अर्जुनको भगवान् शंकरका मन्त्र बताया और उसका जप करनेकी आज्ञा दी। तदनन्तर अपने अनुचरोंको सावधानीके साथ अर्जुनकी रक्षा करनेका आदेश देकर वे अर्जुनसे बोले—'भद्र! तुम्हें कभी भी प्रमादपूर्वक राज्य नहीं करना चाहिये। परंतप! यह विद्या तुम्हारे लिये श्रेयस्करी होगी। साधकको सर्वथा धैर्य धारण किये रहना चाहिये, रक्षक तो भगवान् शिव हैं ही। वे सम्पत्तियाँ और फल (मोक्ष) दोनों समानरूपसे देंगे। इसमें तनिक भी संशय नहीं है।'

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! इस प्रकार अर्जुनको वरदान देकर देवराज इन्द्र शिवजीके चरणकमलोंका स्मरण करते हुए अपने भवनको लौट गये। तब महावीर अर्जुनने भी सुरेश्वरको प्रणाम किया और फिर वे मनको वशमें करके इन्द्रके उपदेशानुसार शिवजीके उद्देश्यसे तपस्या करने लगे।

(अध्याय ३३—३८)


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