शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* विद्येश्वरसंहिता * ४५
तो यह प्राणियोंको जन्म और मृत्युके कष्टसे छुड़ानेवाला है। अग्निके पहाड़-जैसा जो यह शिवलिंग यहाँ प्रकट हुआ है, इसके कारण यह स्थान 'अरुणाचल' नामसे प्रसिद्ध होगा। यहाँ अनेक प्रकारके बड़े-बड़े तीर्थ प्रकट होंगे। इस स्थानमें निवास करने या मरनेसे जीवोंका मोक्षतक हो जायगा।
मेरे दो रूप हैं—'सकल' और 'निष्कल'। दूसरे किसीके ऐसे रूप नहीं हैं। पहले मैं स्तम्भरूपसे प्रकट हुआ; फिर अपने साक्षात्-रूपसे। 'ब्रह्मभाव' मेरा 'निष्कल' रूप है और 'महेश्वरभाव' 'सकल' रूप। ये दोनों मेरे ही सिद्धरूप हैं। मैं ही परब्रह्म परमात्मा हूँ। कलायुक्त और अकल मेरे ही स्वरूप हैं। ब्रह्मरूप होनेके कारण मैं ईश्वर भी हूँ। जीवोंपर अनुग्रह आदि करना मेरा कार्य है। ब्रह्मा और केशव! मैं सबसे बृहत् और जगत्की वृद्धि करनेवाला होनेके कारण 'ब्रह्म' कहलाता हूँ। सर्वत्र समरूपसे स्थित और व्यापक होनेसे मैं ही सबका आत्मा हूँ। सर्गसे लेकर अनुग्रहतक (आत्मा या ईश्वरसे भिन्न) जो जगत्-सम्बन्धी पाँच कृत्य हैं, वे सदा मेरे ही हैं, मेरे अतिरिक्त दूसरे किसीके नहीं हैं; क्योंकि मैं ही सबका ईश्वर हूँ। पहले मेरी ब्रह्मरूपताका बोध करानेके लिये 'निष्कल' लिंग प्रकट हुआ था। फिर अज्ञात ईश्वरत्वका साक्षात्कार करानेके निमित्त मैं साक्षात् जगदीश्वर ही 'सकल' रूपमें तत्काल प्रकट हो गया। अतः मुझमें जो ईशत्व है, उसे ही मेरा सकलरूप जानना चाहिये तथा जो यह मेरा निष्कल स्तम्भ है, वह मेरे ब्रह्मस्वरूपका बोध करानेवाला है। यह मेरा ही लिंग (चिह्न) है। तुम दोनों प्रतिदिन यहाँ रहकर इसका पूजन करो। यह मेरा ही स्वरूप है और मेरे सामीप्यकी प्राप्ति करानेवाला है। लिंग और लिंगीमें नित्य अभेद होनेके कारण मेरे इस लिंगका महान् पुरुषोंको भी पूजन करना चाहिये। मेरे एक लिंगकी स्थापना करनेका यह फल बताया गया है कि उपासकको मेरी समानताकी प्राप्ति हो जाती है। यदि एकके बाद दूसरे शिव-लिंगकी भी स्थापना कर दी गयी, तब तो उपासकको फलरूपसे मेरे साथ एकत्व (सायुज्य मोक्ष) रूप फल प्राप्त होता है। प्रधानतया शिवलिंगकी ही स्थापना करनी चाहिये। मूर्तिकी स्थापना उसकी अपेक्षा गौण कर्म है। शिवलिंगके अभावमें सब ओरसे सवेर (मूर्तियुक्त) होनेपर भी वह स्थान क्षेत्र नहीं कहलाता। (अध्याय ९)
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पाँच कृत्योंका प्रतिपादन, प्रणव एवं पंचाक्षर-मन्त्रकी महत्ता, ब्रह्मा-विष्णुद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति तथा उनका अन्तर्धान
ब्रह्मा और विष्णुने पूछा—प्रभो! सृष्टि आदि पाँच कृत्योंके लक्षण क्या हैं, यह हम दोनोंको बताइये।
भगवान् शिव बोले—मेरे कर्तव्योंको समझना अत्यन्त गहन है, तथापि मैं कृपापूर्वक तुम्हें उनके विषयमें बता रहा हूँ। ब्रह्मा और अच्युत! 'सृष्टि', 'पालन', 'संहार', 'तिरोभाव' और 'अनुग्रह'—ये पाँच ही मेरे जगत्-सम्बन्धी कार्य हैं, जो नित्यसिद्ध हैं। संसारकी रचनाका जो