भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 513

* कोटिरुद्रसंहिता * ४९९


स्मरण करे। जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर इन बारह नामोंका पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो सम्पूर्ण सिद्धियोंका फल प्राप्त कर लेता है।$^१$

मुनीश्वरो! जिस-जिस मनोरथको पानेकी इच्छा रखकर श्रेष्ठ मनुष्य इन बारह नामोंका पाठ करेंगे, वे इस लोक और परलोकमें उस मनोरथको अवश्य प्राप्त करेंगे। जो शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुष निष्कामभावसे इन नामोंका पाठ करेंगे, उन्हें कभी माताके गर्भमें निवास नहीं करना पड़ेगा। इन सबके पूजनमात्रसे ही इहलोकमें समस्त वर्णोंके लोगोंके दुःखोंका नाश हो जाता है और परलोकमें उन्हें अवश्य मोक्ष प्राप्त होता है। इन बारह ज्योतिर्लिंगोंका नैवेद्य यत्नपूर्वक ग्रहण करना (खाना) चाहिये। ऐसा करनेवाले पुरुषके सारे पाप उसी क्षण जलकर भस्म हो जाते हैं।$^२$

यह मैंने ज्योतिर्लिंगोंके दर्शन और पूजनका फल बताया। अब ज्योतिर्लिंगोंके उपलिंग बताये जाते हैं। मुनीश्वरो! ध्यान देकर सुनो। सोमनाथका जो उपलिंग है, उसका नाम अन्तकेश्वर है। वह उपलिंग मही नदी और समुद्रके संगमपर स्थित है। मल्लिकार्जुनसे प्रकट उपलिंग रुद्रेश्वरके नामसे प्रसिद्ध है। वह भृगुकक्षमें स्थित है और उपासकोंको सुख देनेवाला है। महाकालसम्बन्धी उपलिंग दुग्धेश्वर या दूधनाथके नामसे प्रसिद्ध है। वह नर्मदाके तटपर है तथा समस्त पापोंका निवारण करनेवाला कहा गया है। ओंकारेश्वर-सम्बन्धी उपलिंग कर्दमेश्वरके नामसे प्रसिद्ध है। वह बिन्दु सरोवरके तटपर है और उपासकको सम्पूर्ण मनोवांछित फल प्रदान करता है। केदारेश्वरसम्बन्धी उपलिंग भूतेश्वरके नामसे प्रसिद्ध है और यमुनातीरपर स्थित है। जो लोग उसका दर्शन और पूजन करते हैं, उनके बड़े-से-बड़े पापोंका वह निवारण करनेवाला बताया गया है। भीमशंकरसम्बन्धी उपलिंग भीमेश्वरके नामसे प्रसिद्ध है। वह भी सह्य पर्वतपर ही स्थित है और महान् बलकी वृद्धि करनेवाला है। नागेश्वरसम्बन्धी उपलिंगका नाम भी भूतेश्वर ही है, वह मल्लिका सरस्वतीके तटपर स्थित है और दर्शन करनेमात्रसे सब पापोंको हर लेता है। रामेश्वरसे प्रकट हुए उपलिंगको गुप्तेश्वर और घुश्मेश्वरसे प्रकट हुए उपलिंगको व्याघ्रेश्वर कहा गया है। ब्राह्मणो! इस प्रकार यहाँ मैंने ज्योतिर्लिंगोंके उपलिंगोंका परिचय दिया।


१- सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोंकारे परमेश्वरम्॥
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशङ्करम्। वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे॥
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने। सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मेशं तु शिवालये॥
द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्। सर्वपापैर्विनिर्मुक्तः सर्वसिद्धिफलं लभेत्॥
(शि० पु० कोटिरु० सं० १। २१-२४)

२- ग्राह्यमेषां च नैवेद्यं भोजनीयं प्रयत्नतः। तत्कर्तुः सर्वपापानि भस्मसाद्यान्ति वै क्षणात्॥
(शि० पु० को० रु० सं० १। २८)