शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* कोटिरुद्रसंहिता *
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लगी। दो घड़ी बाद जब उसे चेत हुआ, तब उसने आँखें खोलीं।
आँख खुलनेपर उस शिशुने देखा, उसका वही शिविर भगवान् शिवके अनुग्रहसे तत्काल महाकालका सुन्दर मन्दिर बन गया, मणियोंके चमकीले खंभे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वहाँकी भूमि स्फटिकमणिसे जड़ दी गयी थी। तपाये हुए सोनेके बहुत-से विचित्र कलश उस शिवालयको सुशोभित करते थे। उसके विशाल द्वार, कपाट और प्रधान द्वार सुवर्णमय दिखायी देते थे। वहाँ बहुमूल्य नीलमणि तथा हीरेके बने हुए चबूतरे शोभा दे रहे थे। उस शिवालयके मध्यभागमें दयानिधान शंकरका रत्नमय लिंग प्रतिष्ठित था। ग्वालिनके उस पुत्रने देखा, उस शिवलिंगपर उसकी अपनी ही चढ़ायी हुई पूजन-सामग्री सुसज्जित है। यह सब देख वह बालक सहसा उठकर खड़ा हो गया। उसे मन-ही-मन बड़ा आश्चर्य हुआ और वह परमानन्दके समुद्रमें निमग्न-सा हो गया। तदनन्तर भगवान् शिवकी स्तुति करके उसने बारंबार उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया और सूर्यास्त होनेके पश्चात् वह गोपबालक शिवालयसे बाहर निकला। बाहर आकर उसने अपने शिविरको देखा। वह इन्द्रभवनके समान शोभा पा रहा था। वहाँ सब कुछ तत्काल सुवर्णमय होकर विचित्र एवं परम उज्ज्वल वैभवसे प्रकाशित होने लगा। फिर वह उस भवनके भीतर गया, जो सब प्रकारकी शोभाओंसे सम्पन्न था। उस भवनमें सर्वत्र मणि, रत्न और सुवर्ण ही जड़े गये थे। प्रदोषकालमें सानन्द भीतर प्रवेश करके बालकने देखा, उसकी माँ दिव्य लक्षणोंसे लक्षित हो एक सुन्दर पलंगपर सो रही है। रत्नमय अलंकारोंसे उसके सभी अंग उद्दीप्त हो रहे हैं और वह साक्षात् देवांगनाके समान दिखायी देती है। हर्षसे विह्वल हुए उस बालकने अपनी माताको बड़े वेगसे उठाया। वह भगवान् शिवकी कृपापात्र हो चुकी थी। ग्वालिनने उठकर देखा, सब कुछ अपूर्व-सा हो गया था। उसने महान् आनन्दमें निमग्न हो अपने बेटेको छातीसे लगा लिया। पुत्रके मुखसे गिरिजापतिके कृपाप्रसादका वह सारा वृत्तान्त सुनकर ग्वालिनने राजाको सूचना दी, जो निरन्तर भगवान् शिवके भजनमें लगे रहते थे। राजा अपना नियम पूरा करके रातमें सहसा वहाँ आये और ग्वालिनके पुत्रका वह प्रभाव, जो शंकरजीको संतुष्ट करनेवाला था, देखा। मन्त्रियों और पुरोहितोंसहित राजा चन्द्रसेन वह सब कुछ देख परमानन्दके समुद्रमें डूब गये और नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बहाते तथा प्रसन्नतापूर्वक शिवके नामका कीर्तन करते हुए उन्होंने उस बालकको हृदयसे लगा लिया। ब्राह्मणो! उस समय वहाँ बड़ा भारी उत्सव होने लगा। सब लोग आनन्दविभोर होकर महेश्वरके नाम और यशका कीर्तन करने लगे। इस प्रकार शिवका यह अद्भुत माहात्म्य देखनेसे पुरवासियोंको बड़ा हर्ष हुआ और इसीकी चर्चामें वह सारी रात एक क्षणके समान व्यतीत हो गयी।
युद्धके लिये नगरको चारों ओरसे घेरकर खड़े हुए राजाओंने भी प्रातःकाल अपने गुप्तचरोंके मुखसे वह सारा अद्भुत चरित्र सुना। उसे सुनकर सब आश्चर्यसे चकित हो गये और वहाँ आये हुए सब नरेश