शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* कोटिरुद्रसंहिता * ५२९
उसे उसकी इच्छाके अनुसार अनुपम उत्तम बल प्रदान किया। भगवान् शिवका कृपाप्रसाद पाकर राक्षस रावणने नतमस्तक हो हाथ जोड़कर उनसे कहा—‘देवेश्वर! प्रसन्न होइये। मैं आपको लंकामें ले चलता हूँ। आप मेरे इस मनोरथको सफल कीजिये। मैं आपकी शरणमें आया हूँ।’
रावणके ऐसा कहनेपर भगवान् शंकर बड़े संकटमें पड़ गये और अनमने होकर बोले—‘राक्षसराज! मेरी सारगर्भित बात सुनो। तुम मेरे इस उत्तम लिंगको भक्तिभावसे अपने घरको ले जाओ। परंतु जब तुम इसे कहीं भूमिपर रख दोगे, तब यह वहीं सुस्थिर हो जायगा, इसमें संदेह नहीं है। अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो।’
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर राक्षसराज रावण ‘बहुत अच्छा’ कह वह शिवलिंग साथ लेकर अपने घरकी ओर चला। परंतु मार्गमें भगवान् शिवकी मायासे उसे मूत्रोत्सर्गकी इच्छा हुई। पुलस्त्यनन्दन रावण सामर्थ्यशाली होनेपर भी मूत्रके वेगको रोक न सका। इसी समय वहाँ आस-पास एक ग्वालेको देखकर उसने प्रार्थनापूर्वक वह शिवलिंग उसके हाथमें थमा दिया और स्वयं मूत्रत्यागके लिये बैठ गया। एक मुहूर्त बीतते-बीतते वह ग्वाला उस शिवलिंगके भारसे अत्यन्त पीड़ित हो व्याकुल हो गया, तब उसने उसे पृथ्वीपर रख दिया। फिर तो वह हीरकमय शिवलिंग वहीं स्थित हो गया। वह दर्शन करनेमात्रसे सम्पूर्ण अभीष्टोंको देनेवाला और पापराशिको हर लेनेवाला है। मुने! वही शिवलिंग तीनों लोकोंमें वैद्यनाथेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हुआ, जो सत्पुरुषोंको भोग और मोक्ष देनेवाला है। यह दिव्य उत्तम एवं श्रेष्ठ ज्योतिर्लिंग दर्शन और पूजनसे भी समस्त पापोंको हर लेता है और मोक्षकी प्राप्ति कराता है। वह शिवलिंग जब सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये वहीं स्थित हो गया, तब रावण भगवान् शिवका परम उत्तम वर पाकर अपने घरको चला गया। वहाँ जाकर उस महान् असुरने बड़े हर्षके साथ अपनी प्रिया मन्दोदरीको सारी बातें कह सुनायीं। इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओं और निर्मल मुनियोंने जब यह समाचार सुना, तब वे परस्पर सलाह करके वहाँ आये। उन सबका मन भगवान् शिवमें लगा हुआ था। उन सब देवताओंने उस समय वहाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ शिवका विशेष पूजन किया। वहाँ भगवान् शंकरका प्रत्यक्ष दर्शन करके देवताओंने उस शिव-लिंगकी विधिवत् स्थापना की और उसका वैद्यनाथ नाम रखकर उसकी वन्दना और स्तवन करके वे स्वर्गलोकको चले गये।
ऋषियोंने पूछा—सूतजी! जब वह शिवलिंग वहीं स्थित हो गया तथा रावण अपने घरको चला गया, तब वहाँ कौन-सी