शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* कोटिरुद्रसंहिता * ५३१
होकर भूखों मर जाते हैं। उस अवस्थामें राक्षसी दारूकाने कहा कि 'भवानीके वरदानसे मैं इस सारे वनको जहाँ चाहूँ, ले जा सकती हूँ!' यों कहकर वह समस्त वनको ज्यों-का-त्यों ले जाकर समुद्रमें जा बसी। राक्षसलोग पृथ्वीपर न रहकर जलमें निर्भय रहने लगे और वहाँ प्राणियोंको पीड़ा देने लगे।
एक बार बहुत-सी नावें उधर आ निकलीं, जो मनुष्योंसे भरी थीं। राक्षसोंने उनमें बैठे हुए सब लोगोंको पकड़ लिया और बेड़ियोंसे बाँधकर कारागारमें डाल दिया। वे उन्हें बारंबार धमकियाँ देने लगे। उनमें सुप्रिय नामसे प्रसिद्ध एक वैश्य था, जो उस दलका सरदार था। वह बड़ा सदाचारी, भस्म-रुद्राक्षधारी तथा भगवान् शिवका परम भक्त था। सुप्रिय शिवकी पूजा किये बिना भोजन नहीं करता था। वह स्वयं तो शंकरका पूजन करता ही था, बहुत-से अपने साथियोंको भी उसने शिवकी पूजा सिखा दी थी। फिर सब लोग 'नमः शिवाय' मन्त्रका जप और शंकरजीका ध्यान करने लगे। सुप्रियको भगवान् शिवका दर्शन भी होता था। दारुक राक्षसको जब इस बातका पता लगा, तब उसने आकर सुप्रियको धमकाया। उसके साथी राक्षस सुप्रियको मारने दौड़े। उन राक्षसोंको आया देख सुप्रियके नेत्र भयसे कातर हो गये, वह बड़े प्रेमसे शिवका चिन्तन और उनके नामोंका जप करने लगा।
वैश्यपतिने कहा—देवेश्वर शंकर! मेरी रक्षा कीजिये। कल्याणकारी त्रिलोकीनाथ! दुष्टहन्ता भक्तवत्सल शिव! हमें इस दुष्टसे बचाइये। देव! अब आप ही मेरे सर्वस्व हैं; प्रभो! मैं आपका हूँ, आपके अधीन हूँ और आप ही सदा मेरे जीवन एवं प्राण हैं।
सूतजी कहते हैं—सुप्रियके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भगवान् शंकर एक विवरसे निकल पड़े। उनके साथ ही चार दरवाजोंका एक उत्तम मन्दिर भी प्रकट हो गया। उसके मध्यभागमें अद्भुत ज्योतिर्मय शिवलिंग प्रकाशित हो रहा था। उसके साथ शिव-परिवारके सब लोग विद्यमान थे। सुप्रियने उनका दर्शन करके पूजन किया, पूजित होनेपर भगवान् शम्भुने प्रसन्न हो स्वयं पाशुपतास्त्र लेकर प्रधान-प्रधान राक्षसों, उनके सारे उपकरणों तथा सेवकोंको भी तत्काल ही नष्ट कर दिया और उन दुष्टहन्ता शंकरने अपने भक्त सुप्रियकी रक्षा की। तत्पश्चात् अद्भुत लीला करनेवाले और लीलासे ही शरीर धारण करनेवाले शम्भुने उस वनको यह वर दिया कि आजसे इस वनमें सदा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चारों वर्णोंके धर्मोंका पालन हो। यहाँ श्रेष्ठ मुनि निवास करें और तमोगुणी राक्षस इसमें कभी न रहें। शिवधर्मके उपदेशक, प्रचारक और प्रवर्तक लोग इसमें निवास करें!
सूतजी कहते हैं—इसी समय राक्षसी दारूकाने दीनचित्तसे देवी पार्वतीकी स्तुति की। देवी पार्वती प्रसन्न हो गयीं और बोलीं—'बताओ, तेरा क्या कार्य करूँ?' उसने कहा—'मेरे वंशकी रक्षा कीजिये?' देवी बोलीं—'मैं सच कहती हूँ, तेरे कुलकी रक्षा करूँगी।' ऐसा कहकर देवी भगवान् शिवसे बोलीं—'नाथ! आपकी यह बात युगके अन्तमें सच्ची होगी। तबतक तामसी सृष्टि भी रहे, ऐसा मेरा विचार है। मैं भी