शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* उमासंहिता * ५८९
जाता है। फिर उस शरीरमें सब ओर बड़ी भारी यातनाएँ होती हैं। जो पापी शिव-मन्दिरके पास अथवा देवताके बगीचोंमें मल-मूत्रका त्याग करते हैं, उनके लिंग और अण्डकोशको लोहेके मुद्गरोंसे चूर-चूर कर दिया जाता है तथा आगसे तपायी हुई सुइयाँ उसमें भर दी जाती हैं, जिससे मन और इन्द्रियोंको महान् दुःख होता है। जो धन रहते हुए भी तृष्णाके कारण उसका दान नहीं करते और भोजनके समय घरपर आये हुए अतिथिका अनादर करते हैं, वे पापका फल पाकर अपवित्र नरकमें गिरते हैं।$^१$ जो कुत्तों और गौओंको उनका भाग अर्थात् बलि न देकर स्वयं भोजन कर लेते हैं, उनके खुले हुए मुँहमें दो कीलें ठोक दी जाती हैं। 'यमराजके मार्गका अनुसरण करनेवाले जो श्याम और शबल (साँवले तथा चितकबरे) दो कुत्ते हैं, मैं उनके लिये यह अन्नका भाग देता हूँ, वे इस बलिको ग्रहण करें।' 'पश्चिम, वायव्य, दक्षिण और नैर्ऋत्य दिशामें रहनेवाले जो पुण्यकर्मा कौए हैं, वे मेरी इस दी हुई बलिको ग्रहण करें।'$^२$ इस अभिप्रायके दो मन्त्रोंसे क्रमशः कुत्ते और कौएको बलि देनी चाहिये। जो लोग यत्नपूर्वक भगवान् शंकरकी पूजा करके विधिवत् अग्निमें आहुति दे शिवसम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा बलि समर्पित करते हैं, वे यमराजको नहीं देखते और स्वर्गमें जाते हैं। इसलिये प्रतिदिन बलि देनी चाहिये।
एक चौकोर मण्डप बनाकर उसे गन्ध आदिसे अधिवासित करे। फिर ईशानकोणमें धन्वन्तरिके लिये और पूर्व-दिशामें इन्द्रके लिये बलि दे। दक्षिणदिशामें यमके लिये, पश्चिमदिशामें सुदक्षोमके लिये और दक्षिणदिशामें पितरोंके लिये बलि देकर पुनः पूर्वदिशामें अर्यमाको अन्नका भाग अर्पित करे। द्वारदेशमें धाता और विधाताके लिये बलि निवेदन करे। तदनन्तर कुत्तों, कुत्तोंके स्वामी और पक्षियोंके लिये भूतपर अन्न डाल दे। देवता, पितर, मनुष्य, प्रेत, भूत, गुह्यक, पक्षी, कृमि और कीट—ये सभी गृहस्थसे अपनी जीविका चलाते हैं। स्वाहाकार, स्वधाकार, वषट्कार तथा हन्तकार—ये धर्ममयी धेनुके चार स्तन हैं। स्वाहाकार नामक स्तनका पान देवता करते हैं, स्वधाका पितर लोग, वषट्कारका दूसरे-दूसरे देवता और भूतेश्वर तथा हन्तकार नामक स्तनका सदा ही मनुष्यगण पान करते हैं। जो मानव श्रद्धापूर्वक इस धर्ममयी धेनुका सदा ठीक समयपर पालन करता है, वह अग्निहोत्री हो जाता है। जो स्वस्थ रहते हुए भी उसका त्याग कर देता है, वह अन्धकारपूर्ण नरकमें डूबता है। इसलिये उन सबको बलि देनेके पश्चात् द्वारपर खड़ा हो क्षणभर
१-धने सत्यपि ये दानं न प्रयच्छन्ति तृष्णया ॥
अतिथि चावमन्यन्ते काले प्राप्ते गृहाश्रमे । तस्मात् ते दुष्कृतं प्राप्य गच्छन्ति निरयेऽशुचौ ॥
(शि० पु० उ० सं० १०। ३१-३२)
२-द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ यममार्गानुरोधकौ । यौ स्तस्ताभ्यां प्रयच्छामि तौ गृह्णीतामिमं बलिम् ॥
ऐन्द्रवारुणवायव्या याम्या नैर्ऋत्यकास्तथा । वायसाः पुण्यकर्माणस्ते प्रगृह्णन्तु मे बलिम् ॥
(शि० पु० उ० सं० १०। ३५-३६)