भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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६१६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

वध-प्रसंगसे युक्त इस परम पवित्र उमाचरित्रका जो श्रद्धापूर्वक बारंबार श्रवण या पाठ करता है, वह इस लोकमें देव-दुर्लभ भोगोंका उपभोग करके परलोकमें महामायाके प्रसादसे उमाधामको जाता है। राजन्! इस प्रकार शुम्भासुरका संहार करनेवाली देवी सरस्वतीके चरित्रका वर्णन किया गया, जो साक्षात् उमाके अंशसे प्रकट हुई थीं।

(अध्याय ४८) $$\sim\sim\circ\sim\sim$$

देवताओंका गर्व दूर करनेके लिये तेजःपुंजरूपिणी उमाका प्रादुर्भाव

मुनियोंने कहा—सम्पूर्ण पदार्थोंके पूर्ण ज्ञाता सूतजी! भुवनेश्वरी उमाके, जिनसे सरस्वती प्रकट हुई थीं, अवतारका पुनः वर्णन कीजिये। वे देवी परब्रह्म, मूलप्रकृति, ईश्वरी, निराकार होती हुई भी साकार तथा नित्यानन्दमयी सती कही जाती हैं।

सूतजीने कहा—तपस्वी मुनियो! आपलोग देवीके उत्तम एवं महान् चरित्रको प्रेमपूर्वक सुनें, जिसके जाननेमात्रसे मनुष्य परम गतिको प्राप्त होता है। एक समय देवताओं और दानवोंमें परस्पर युद्ध हुआ। उसमें महामायाके प्रभावसे देवताओंकी जीत हो गयी। इससे देवताओंको अपनी शूरवीरतापर बड़ा गर्व हुआ। वे आत्म-प्रशंसा करते हुए इस बातका प्रचार करने लगे कि 'हमलोग धन्य हैं, धन्यवादके योग्य हैं। असुर हमारा क्या कर लेंगे। वे हमलोगोंका अत्यन्त दुस्सह प्रभाव देखकर भयभीत हो 'भाग चलो! भाग चलो!' कहते हुए पाताललोकमें घुस गये। हमारा बल अद्भुत है! हममें आश्चर्यजनक तेज है। हमारा बल और तेज दैत्यकुलका विनाश करनेमें समर्थ है! अहो! देवताओंका कैसा सौभाग्य है।' इस प्रकार वे जहाँ-तहाँ डींग हाँकने लगे।

तदनन्तर उसी समय उनके समक्ष तेजका एक महान् पुंज प्रकट हुआ, जो पहले कभी देखनेमें नहीं आया था। उसे देखकर सब देवता विस्मयसे भर गये। वे रूँधे हुए गलेसे परस्पर पूछने लगे—'यह क्या है? यह क्या है?' उन्हें यह पता नहीं था कि यह श्यामा (भगवती उमा)-का उत्कृष्ट प्रभाव है, जो देवताओंका अभिमान चूर्ण करनेवाला है।

उस समय देवराज इन्द्रने देवताओंको आज्ञा दी—'तुमलोग जाओ और यथार्थ-रूपसे परीक्षा करो कि यह कौन है।' देवेन्द्रके भेजनेसे वायुदेव उस तेजःपुंजके निकट गये। तब उस तेजोरशिने उन्हें सम्बोधित करके पूछा—'अजी! तुम कौन हो?' उस महान् तेजके इस प्रकार पूछनेपर वायुदेवता अभिमानपूर्वक बोले—'मैं वायु हूँ, सम्पूर्ण जगत्का प्राण हूँ; मुझ सर्वाधार परमेश्वरमें ही यह स्थावर-जंगमरूप सारा जगत् ओतप्रोत है। मैं ही समस्त विश्वका संचालन करता हूँ।' तब उस महातेजने कहा—'वायो! यदि तुम जगत्के संचालनमें समर्थ हो तो यह तृण रखा हुआ है। इसे अपनी इच्छाके अनुसार चलाओ तो सही।' तब वायुदेवताने सभी उपाय करके अपनी सारी शक्ति लगा दी। परंतु वह