भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६३२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

साधकको चाहिये कि वह सम्पूर्ण शास्त्रोंके तत्त्वार्थके ज्ञाता, वेदान्तज्ञानके पारंगत तथा बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ आचार्यकी शरणमें जाय। उत्तम बुद्धिसे युक्त एवं चतुर साधक आचार्यके समीप जाकर विधिपूर्वक दण्ड-प्रणाम आदिके द्वारा उन्हें यत्नपूर्वक संतुष्ट करे। फिर गुरुकी आज्ञा ले वह बारह दिनोंतक केवल दूध पीकर रहे। तदनन्तर शुक्लपक्षकी चतुर्थी या दशमीको प्रातःकाल विधिवत् स्नानकर शुद्धचित्त हुआ विद्वान् साधक नित्य-कर्म करके गुरुको बुलाकर शास्त्रोक्त विधिसे नान्दीश्राद्ध करे। नान्दीश्राद्धमें विश्वेदेवोंकी संज्ञा सत्य और वसु बतायी गयी है। प्रथम देवश्राद्धमें नान्दीमुख-देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहे गये हैं। दूसरे ऋषिश्राद्धमें उन्हें ब्रह्मर्षि, देवर्षि तथा राजर्षि कहा गया है। तीसरे दिव्य श्राद्धमें उनकी वसु, रुद्र और आदित्य संज्ञा बतायी गयी है। चौथे मनुष्यश्राद्धमें सनक$^१$ आदि चार मुनीश्वर ही नान्दीमुख-देवता हैं। पाँचवें भूत-श्राद्धमें पाँच महाभूत, नेत्र आदि ग्यारह इन्द्रियसमूह तथा जरायुज आदि चतुर्विध प्राणिसमुदाय नान्दीमुख माने गये हैं। छठे पितृश्राद्धमें पिता, पितामह और प्रपितामह—ये तीन नान्दीमुख-देवता हैं। सातवें मातृश्राद्धमें माता, पितामही और प्रपितामही—इन तीनोंको नान्दीमुख-देवता बताया गया है तथा आठवें आत्मश्राद्धमें आत्मा, पिता, पितामह और प्रपितामह—ये चार नान्दीमुखदेवता कहे गये हैं$^२$। मातामहात्मक श्राद्धमें मातामह, प्रमातामह और वृद्ध-प्रमातामह—ये तीन नान्दीमुख देवता सपत्नीक बताये गये हैं। प्रत्येक श्राद्धमें दो-दो ब्राह्मण करके जितने ब्राह्मण आवश्यक हों, उनको आमन्त्रित करे और स्वयं यत्नपूर्वक आचमन करके पवित्र हो उन ब्राह्मणोंके पैर धोये। उस समय इस प्रकार कहे—‘जो समस्त सम्पत्तिकी प्राप्तिमें कारण, आयी हुई आपत्तिके समूहको नष्ट करनेके लिये धूमकेतु (अग्नि)-रूप तथा अपार संसारसागरसे पार लगानेके लिये सेतुके समान हैं, वे ब्राह्मणोंकी चरणधूलियाँ मुझे पवित्र करें। जो आपत्तिरूपी घने अन्धकारको दूर करनेके लिये सूर्य, अभीष्ट अर्थको देनेके लिये कामधेनु तथा समस्त तीर्थोंके जलसे पवित्र मूर्तियाँ हैं, वे ब्राह्मणोंकी चरणधूलियाँ मेरी रक्षा करें।’$^३$

ऐसा कह पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़कर साष्टांग प्रणाम करे। तत्पश्चात् पूर्वाभिमुख बैठकर भगवान् शंकरके युगल चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हुए दृढ़तापूर्वक आसन ग्रहण करे। हाथमें पवित्री ले शुद्ध हो नूतन यज्ञोपवीत धारण कर तीन बार प्राणायाम करे। तदनन्तर तिथि आदिका स्मरण करके इस तरह संकल्प करे—‘मेरे संन्यासका अंगभूत जो पहले विश्वेदेवका पूजन, फिर देवादि अष्टविधि श्राद्ध तथा अन्तमें


१-सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार।
२-धर्मसिन्धुकार आदिने आत्मश्राद्धमें भी तीन ही नान्दीमुख कहे हैं—आत्मा, पिता और पितामह।
३-समस्तसंपत्समवाप्तिहेतवः समुत्थितापत्कुलधूमकेतवः। अपारसंसारसमुद्रसेतवः पुनन्तु मां ब्राह्मणपादरेणवः ॥
आपद्धनध्वान्तसहस्रभानवः समीहितार्थार्पणकामधेनवः। समस्ततीर्थाम्बुपवित्रमूर्तयो रक्षन्तु मां ब्राह्मणपादपांसवः ॥
(शि० पु० कै० सं० १२। ४४-४५)