भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 667
  • कैलाससंहिता * ६५३

कारण पूर्ण हूँ। नित्यमुक्त भी मैं ही हूँ। पशु (जीव) मेरी कृपासे मुक्त होकर मेरे स्वरूपको प्राप्त होते हैं। जो सर्वात्मक शम्भु हैं, वही मैं हूँ। मैं शिवरूप हूँ। वामदेव! इस प्रकार सम्पूर्ण वाक्योंके अर्थ भगवान् शिव ही बताये गये हैं$^१$। ईशावास्योपनिषद्की श्रुतिके दो वाक्योंद्वारा प्रतिपादित अर्थ साक्षात् शिवकी एकताका ज्ञान प्रदान करनेवाला होता है। गुरुको चाहिये कि शिष्योंको इसका आदरपूर्वक उपदेश करे।

गुरुको उचित है कि वे आधारसहित शंखको लेकर अस्त्र-मन्त्र (फट्)-से तथा भस्मद्वारा उसकी शुद्धि करके उसे अपने सामने चौकोर मण्डलमें स्थापित करे। फिर ओंकारका उच्चारण करके गन्ध आदिके द्वारा उस शंखकी पूजा करे। उसमें वस्त्र लपेट दे और सुगन्धित जल भरकर प्रणवका उच्चारण करते हुए उसका पूजन करे। तत्पश्चात् सात बार प्रणवके द्वारा फिर उस शंखको अभिमन्त्रित करके शिष्यसे कहे—'हे शिष्य! जो थोड़ा-सा भी अन्तर करता है—भेदभाव रखता है, वह भयका भागी होता है। यह श्रुतिका सिद्धान्त बताया गया, इसलिये तुम अपने चित्तको स्थिर करके निर्भय हो जाओ$^२$।' ऐसा कहकर गुरु स्वयं महादेवजीका ध्यान करते हुए उन्हींके रूपमें शिष्यका अर्चन करे। शिष्यके आसनकी पूजा करके उसमें शिवके आसन और शिवकी मूर्तिकी भावना करे। फिर सिरसे पैरतक 'सद्योजातादि' पाँच मन्त्रोंका न्यास करके मस्तक, मुख और कलाओंके भेदसे प्रणवकी कलाओंका भी न्यास करे। शिष्यके शरीरमें अड़तीस मन्त्ररूपा प्रणवकी कलाओंका न्यास करके उसके मस्तकपर शिवका आवाहन करे। तत्पश्चात् स्थापनी आदि मुद्राओंका प्रदर्शन करे। फिर अंगन्यास करके आसनपूर्वक षोडश उपचारोंकी कल्पना करे। खीरका नैवेद्य अर्पण करके 'ॐ स्वाहा' का उच्चारण करे। कुल्ला और आचमन कराये। अर्घ्य आदि देकर क्रमशः धूप-दीपादि समर्पित करे। शिवके आठ नामोंसे पूजन करके वेदोंके पारंगत ब्राह्मणोंके साथ 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' इत्यादि ब्रह्मानन्दवल्लीके मन्त्रोंको तथा 'भृगुर्वे वारुणि:' इत्यादि भृगुवल्लीके मन्त्रोंको पढ़े। तत्पश्चात् 'यो देवानां प्रथमं पुरस्तात्'—(१०।३) से लेकर 'तस्य प्रकृतिलीनस्य यः परः स महेश्वरः' (१०।८)


१-तत्त्वयोश्चास्यहं प्राणः सर्वः सर्वात्मको ह्यहम्। जीवस्य चान्तर्यामित्वाज्जीवोऽहं तस्य सर्वदा॥
यद् भूतं यच्च भव्यं यद् भविष्यत् सर्वमेव च। मन्मयत्वादहं सर्वः सर्वो वै रुद्र इत्यपि॥
श्रुतिराह मुने सा हि साक्षाच्छिवमुखोद्गता। सर्वात्मा परमैर्भगिर्गुणैर्नित्यसमन्वयात्॥
स्वस्मात् परात्मविरहाद्दितीयोऽहमेव हि। सर्वं खल्विदं ब्रह्मेति वाक्यार्थः पूर्वमीरितः॥
पूर्णोऽहं भावरूपत्वान्नित्यमुक्तोऽहमेव हि। पशवो मत्प्रसादेन मुक्ता मद्भावमाश्रिताः॥
योऽसौ सर्वात्मकः शम्भुस्सोऽहं हंस शिवोऽस्म्यहम्। इति वै सर्ववाक्यार्थो वामदेव शिवोदितः॥
(शि० पु० कै० सं० १९। २६—३१)
२-यस्त्वन्तरं किंचिदपि कुरुतेऽस्त्यति भीतिभाक्। इत्याह श्रुतिसत्तत्त्वं दृष्टात्मा गतभीर्भव॥
(शि० पु० कै० सं० १९। ३५-३६)