शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* वायवीयसंहिता * ६६७
स्रष्टा हैं, जो सम्पूर्ण जीवोंका शरीरसे संयोग और वियोग करानेमें हेतु हैं, उन ब्रह्माजीको नमस्कार है। नाथ! पितामह! आपसे ही सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि, पालन और संहार होते हैं, तथापि मायासे आवृत्त होनेके कारण हम आपको नहीं जानते।
सूतजी कहते हैं—उन महाभाग महर्षियोंके इस प्रकार स्तुति करनेपर ब्रह्माजी उन मुनियोंको आह्लाद प्रदान करते हुए गम्भीर वाणीमें इस प्रकार बोले।
ब्रह्माजीने कहा—महान् सत्त्वगुणसे सम्पन्न महाभाग महातेजस्वी महर्षियो! तुम सब लोग एक साथ यहाँ किसलिये आये हो?
ब्रह्माजीके इस प्रकार पूछनेपर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ उन सभी मुनियोंने हाथ जोड़ विनयभरी वाणीमें कहा।
मुनि बोले—भगवन्! हमलोग अज्ञानके महान् अन्धकारसे आवृत्त हो खिन्न हो रहे हैं। परस्पर विवाद करते हुए हमें परमतत्त्वका साक्षात्कार नहीं हो रहा है। आप सम्पूर्ण जगत्के धारण-पोषण करनेवाले तथा समस्त कारणोंके भी कारण हैं। नाथ! यहाँ कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको विदित न हो। कौन ऐसा पुरुष है, जो सम्पूर्ण जीवोंसे पुरातन, अन्तर्यामी, उत्कृष्ट विशुद्ध परिपूर्ण एवं सनातन परमेश्वर है? कौन अपने अद्भुत क्रियाकलापद्वारा सबसे प्रथम संसारकी सृष्टि करता है? महाप्राज्ञ! हमारे इस संदेहका निवारण करनेके लिये आप हमें परमार्थतत्त्वका उपदेश दें।
मुनियोंके इस प्रकार पूछनेपर ब्रह्माजीके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। वे देवताओं, दानवों और मुनियोंके निकट खड़े हो गये और चिरकालतक ध्यानमग्न हो ‘रुद्र’ ऐसा कहते हुए आनन्दविभोर हो गये। उनका सारा शरीर पुलकित हो उठा और वे हाथ जोड़कर बोले।
(अध्याय २)
ब्रह्माजीके द्वारा परमतत्त्वके रूपमें भगवान् शिवकी ही महत्ताका प्रतिपादन, उनकी कृपाको ही सब साधनोंका फल बताना तथा उनकी आज्ञासे सब मुनियोंका नैमिषारण्यमें आना
ब्रह्माजीने कहा—मुनियो! जिन्हें न पाकर मनसहित वाणी लौट आती है, जिनके आनन्दमय स्वरूपका अनुभव करनेवाला पुरुष कभी किसीसे नहीं डरता, जिनसे सम्पूर्ण भूतों और इन्द्रियोंके साथ ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इन्द्रपूर्वक यह समस्त जगत् पहले प्रकट होता है, जो कारणोंके भी स्रष्टा और विचारक परम कारण हैं, जिनके सिवा और किसीसे कभी भी जगत्की उत्पत्ति नहीं होती, * सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न होनेके
* यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं यस्य वै विद्वान् न बिभेति कुतश्चन॥
यस्मात् सर्वमिदं ब्रह्मविष्णुरुद्रेन्द्रपूर्वकम्। सह भूतेन्द्रियैः सर्वैः प्रथमं सम्प्रसूयते॥
कारणानां च यो धाता ध्याता परमकारणम्। न सम्प्रसूयतेऽन्यस्मात् कुतश्चन कदाचन॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ३। १–३)