भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 683

* वायवीयसंहिता * ६६९

युक्त इस सम्पूर्ण जगत्‌के पालक हैं। उत्तरोत्तर उत्कृष्ट भूतोंसे वे परम उत्कृष्ट हैं। उनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। अनन्त आनन्दराशिरूपी मकरन्दका पान करनेवाले मधुव्रत (भ्रमर) हैं। अखण्ड ब्रह्माण्डोंको मसलकर मृत्पिण्डके समान कर देनेकी कलामें पण्डित हैं। उदारता, वीरता, गम्भीरता और मधुरताके महासागर हैं। इनके समान भी कोई वस्तु नहीं है, फिर इनसे बढ़कर तो हो ही कैसे सकती है। ये उपमारहित हैं। समस्त प्राणियोंके राजाधिराजके रूपमें विराजमान हैं। ये ही सृष्टिके प्रारम्भमें अपने अद्भुत क्रियाकलापद्वारा इस सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि करते हैं और अन्तकालमें यह फिर इन्हींमें लीन हो जायगा। सब प्राणी इन्हींके वशमें हैं। ये ही सबको विभिन्न कार्योंमें नियुक्त करनेवाले हैं। पराभक्तिसे ही इनका दर्शन होता है, अन्य किसी प्रकारसे कभी नहीं।

व्रत, सम्पूर्ण दान, तपस्या और नियम—इन सब साधनोंको पूर्वकालमें सत्पुरुषोंने भावशुद्धि तथा अनुरागकी उत्पत्तिके लिये ही बताया था, इसमें संशय नहीं है। मैं, भगवान् विष्णु, रुद्रदेव तथा दूसरे-दूसरे देवता एवं असुर आज भी उग्र तपस्याओंके द्वारा उनके दर्शनकी इच्छा रखते हैं। धर्मभ्रष्ट, मूढ़, दुष्ट और घृणित आचार-विचारवाले लोगोंको उनका दर्शन होना असम्भव है। भक्तजन भीतर और बाहर भी उन्हींका पूजन एवं ध्यान करते हैं। यह रूप तीन प्रकारका है—स्थूल, सूक्ष्म और इन दोनोंसे परे। हम सब देवता आदि जिस रूपको प्रत्यक्ष देखते हैं, वह स्थूल है। सूक्ष्मरूपका दर्शन केवल योगियोंको होता है और उससे भी परे जो नित्य, ज्ञानस्वरूप आनन्दमय तथा अविनाशी भगवत्स्वरूप है, वह उसमें निष्ठा रखनेवाले भजनपरायण भक्तोंकी ही दृष्टिमें आता है। भगवद्व्रतका आश्रय लेनेवाले भक्त ही उसको देख पाते हैं। इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ, गुह्यसे भी गुह्यतर एवं उत्कृष्ट साधन है भगवान् शिवके प्रति भक्ति। जो उस भक्तिसे युक्त है, वह संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है—इसमें संदेह नहीं है। वह भक्ति भगवान् शिवकी कृपासे ही उपलब्ध होती है और उनकी कृपा भी भक्तिसे ही सम्भव होती है—इस प्रकार ये दोनों एक-दूसरेके आश्रित हैं—ठीक वैसे ही, जैसे अंकुरसे बीज और बीजसे अंकुर होता है। जीवको भगवत्कृपासे ही सर्वत्र सिद्धियाँ मिलती हैं। सम्पूर्ण साधनोंसे अन्तमें भगवान्‌की कृपा ही साध्य है। अन्तःकरणकी शुद्धि या प्रसादका साधन है धर्म और उस धर्मके स्वरूपका प्रतिपादन वेदने किया है। वेदोंके अभ्याससे पहलेके पुण्य और पापोंमें समता आती है, उस समतासे प्रसाद (प्रसन्नता या अन्तःशुद्धि)-का सम्पर्क प्राप्त होता है और उससे धर्मकी वृद्धि होती है। धर्मकी वृद्धिसे पशु (जीव)-के पापोंका क्षय होता है। इस तरह जिसके पाप क्षीण हो गये हैं, उस जीवको अनेक जन्मोंके अभ्याससे क्रमशः उमा-महेश्वरके तत्त्वका ज्ञान प्राप्त होकर उसके हृदयमें उनके प्रति भक्तिका उदय होता है। उस भक्तिभावके अनुरूप ही महेश्वरके कृपाप्रसादका उद्रेक होता है। उस प्रसादसे कर्मोंका त्याग होता है। कर्मोंके त्यागका अभिप्राय उनके फलोंके त्यागसे है, कर्मोंके स्वरूपतः त्यागसे नहीं। अतः यह सिद्ध