भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६७६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

परमेश्वरको जानता हूँ। इनकी अंगकान्ति सूर्यके समान है। ये प्रभु अज्ञानान्धकारसे परे विराजमान हैं।$^{१}$ इन परमात्मासे परे दूसरी कोई वस्तु नहीं है। इनसे अत्यन्त सूक्ष्म और इनसे अधिक महान् भी कुछ नहीं है। इनसे यह सारा जगत् परिपूर्ण है। इनके सब ओर हाथ, पैर, नेत्र, मस्तक, मुख और कान हैं। ये लोकमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं। ये सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाले हैं, परंतु वास्तवमें सब इन्द्रियोंसे रहित हैं। सबके स्वामी, शासक, शरणदाता और सुहृद् हैं। ये नेत्रके बिना भी देखते हैं और कानके बिना भी सुनते हैं। ये सबको जानते हैं, किंतु इनको पूर्णरूपसे जाननेवाला कोई नहीं है। इन्हें परम पुरुष कहते हैं। ये अणुसे भी अत्यन्त अणु और महान्‌से भी परम महान् हैं। ये अविनाशी महेश्वर इस जीवकी हृदय-गुफामें निवास करते हैं।$^{२}$

एक साथ रहनेवाले दो पक्षी एक ही वृक्ष (शरीर)-का आश्रय लेकर रहते हैं। उनमेंसे एक तो उस वृक्षके कर्मरूप फलोंका स्वाद ले-लेकर उपभोग करता है, किंतु दूसरा उस वृक्षके फलका उपभोग न करता हुआ केवल देखता रहता है।$^{३}$ जीवात्मा इस वृक्षके प्रति आसक्तिमें डूबा हुआ है, अतः मोहित होकर शोक करता रहता है। वह जब कभी भगवत्कृपासे भक्तसेवित परम कारणरूप परमेश्वरका और उनकी महिमाका साक्षात्कार कर लेता है, तब शोकरहित हो सुखी हो जाता है। छन्द, यज्ञ, क्रतु तथा भूत, वर्तमान और भविष्य सम्पूर्ण विश्वको वह मायावी रचता है और मायासे ही उसमें प्रविष्ट होकर रहता है। प्रकृतिको ही माया समझना चाहिये और महेश्वर ही वह मायावी है।$^{४}$ ये विश्वकर्मा महेश्वर ही परम देवता परमात्मा हैं, जो सबके हृदयमें विराजमान हैं। उन्हें जानकर ही पुरुष परमानन्दमय अमृतका अनुभव करता है। ब्रह्मासे भी श्रेष्ठ, असीम एवं अविनाशी परमात्मामें विद्या और अविद्या दोनों गूढ़भावसे स्थित


१-विश्वस्मादधिको रुद्रो महर्षिरिति हि श्रुतिः॥
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तममृतं ध्रुवम्। आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्संस्थितं प्रभुम्॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ६। १७-१८)

२-सर्वतःपाणिपादोऽयं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः। सर्वतःश्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥
सर्वेन्द्रियगुणाभासः सर्वेन्द्रियविवर्जितः। सर्वस्य प्रभुरीशानः सर्वस्य शरणं सुहृत्॥
अचक्षुरपि यः पश्यत्यकर्णोऽपि शृणोति यः। सर्वं वेत्ति न वेत्तास्य तमाहुः पुरुषं परम्॥
अणोरणीयान्महतो महीयानयमव्ययः। गुहायां निहितश्चापि जन्तोरस्य महेश्वरः॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ६। २१-२४)

३-द्वौ सुपर्णौ च सयुजौ समानं वृक्षमाश्रितौ। एकोऽत्ति पिप्पलं स्वादु परोऽनश्नन् प्रपश्यति॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ६। ३०)

४-छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो यद्भूतं भव्यमेव च।
माया विश्वं सृजत्यस्मिन्निविष्टो मायया परः। मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ६। ३२-३३)


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