भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 694
६८०* संक्षिप्त शिवपुराण *

करकमलोंद्वारा ब्रह्माजीका स्पर्श करते हुए बोले—'देव! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैं परमात्मा हूँ और इस समय तुम्हारा पुत्र होकर प्रकट हुआ हूँ। ये जो ग्यारह रुद्र हैं, तुम्हारी सुरक्षाके लिये यहाँ आये हैं। अतः तुम मेरे अनुग्रहसे इस तीव्र मूर्च्छाको त्यागकर जाग उठो और पूर्ववत् प्रजाकी सृष्टि करो।'

भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर ब्रह्माजीके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन विश्वात्माने आठ नामोंद्वारा परमेश्वर शिवका स्तवन किया।

ब्रह्माजी बोले—भगवन्! रुद्र! आपका तेज असंख्य सूर्योंके समान अनन्त है। आपको नमस्कार है। रसस्वरूप और जलमय विग्रहवाले आप भवदेवताको नमस्कार है। नन्दी और सुरभि (कामधेनु) ये दोनों आपके स्वरूप हैं। आप पृथ्वीरूपधारी शर्वको नमस्कार है। स्पर्शमय वायुरूपवाले आपको नमस्कार है। आप ही वसुरूपधारी ईश हैं। आपको नमस्कार है। अत्यन्त तेजस्वी अग्निरूप आप पशुपतिको नमस्कार है। शब्दतन्मात्रासे युक्त आकाशरूपधारी आप भीमदेवको नमस्कार है। उग्ररूपवाले यजमानमूर्ति आपको नमस्कार है। सोमरूप आप अमृतमूर्ति महादेवजीको नमस्कार है। इस प्रकार आठ मूर्ति और आठ नामवाले आप भगवान् शिवको मेरा नमस्कार है।*

इस प्रकार विश्वनाथ महादेवजीकी स्तुति करके लोकपितामह ब्रह्माने प्रणामपूर्वक उनसे प्रार्थना की—'भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी मेरे पुत्र भगवान् महेश्वर! कामनाशन! आप सृष्टिके लिये मेरे शरीरसे उत्पन्न हुए हैं; इसलिये जगत्प्रभो! इस महान् कार्यमें संलग्न हुए मुझ ब्रह्माकी आप सर्वत्र सहायता करें और स्वयं भी प्रजाकी सृष्टि करें।'

ब्रह्माजीके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर कल्याणकारी, त्रिपुरनाशक रुद्रदेवने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी बात मान ली। तदनन्तर प्रसन्न हुए महादेवजीका अभिनन्दन करके सृष्टिके लिये उनकी आज्ञा पाकर भगवान् ब्रह्माने अन्यान्य प्रजाओंकी सृष्टि आरम्भ की। उन्होंने अपने मनसे ही मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अत्रि और वसिष्ठकी सृष्टि की। ये सब ब्रह्माजीके पुत्र कहे गये हैं। धर्म, संकल्प और रुद्रके साथ इनकी संख्या बारह होती है। ये सब पुराने गृहस्थ हैं। देवगणोंसहित इनके बारह दिव्य वंश कहे गये हैं। जो प्रजावान्, क्रियावान् तथा महर्षियोंसे अलंकृत हैं। तत्पश्चात् जलपर स्थित हुए रुद्रसहित ब्रह्माजीने देवताओं, असुरों, पितरों और


* ब्रह्मोवाच—
नमस्ते भगवन् रुद्र भास्करामिततेजसे। नमो भवाय देवाय रसायाम्बुमयात्मने ॥
शर्वाय क्षितिरूपाय नन्दीसुरभये नमः। ईशाय वसवे तुभ्यं नमः स्पर्शमयात्मने ॥
पशूनां पतये चैव पावकायातितेजसे। भीमाय व्योमरूपाय शब्दमात्राय ते नमः ॥
उग्रायोग्रस्वरूपाय यजमानात्मने नमः। महाशिवाय सोमाय नमस्त्वमृतमूर्तये ॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० १२। ४१–४४)