शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंॐ नमः शिवाय
निवेदन
‘शिवपुराण’ एक प्रमुख तथा सुप्रसिद्ध पुराण है, जिसमें परात्पर परब्रह्म परमेश्वरके ‘शिव’ (कल्याणकारी) स्वरूपका तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा एवं उपासनाका सुविस्तृत वर्णन है। भगवान् शिव मात्र पौराणिक देवता ही नहीं, अपितु वे पंचदेवोंमें प्रधान, अनादि सिद्ध परमेश्वर हैं एवं निगमागम आदि सभी शास्त्रोंमें महिमामण्डित महादेव हैं। वेदोंने इस परमतत्त्वको अव्यक्त, अजन्मा, सबका कारण, विश्वप्रपंचका स्रष्टा, पालक एवं संहारक कहकर उनका गुणगान किया है। श्रुतियोंने सदाशिवको स्वयम्भू, शान्त, प्रपंचातीत, परात्पर, परमतत्त्व, ईश्वरोंके भी परम महेश्वर कहकर स्तुति की है। ‘शिव’ का अर्थ ही है—‘कल्याणस्वरूप’ और ‘कल्याणप्रदाता’। परम ब्रह्मके इस कल्याणरूपकी उपासना उच्चकोटिके सिद्धों, आत्मकल्याणकामी साधकों एवं सर्वसाधारण आस्तिक जनों—सभीके लिये परम मंगलमय, परम कल्याणकारी, सर्वसिद्धिदायक और सर्वश्रेयस्कर है। शास्त्रोंमें उल्लेख मिलता है कि देव, दनुज, ऋषि, महर्षि, योगीन्द्र, मुनीन्द्र, सिद्ध, गन्धर्व ही नहीं, अपितु ब्रह्मा-विष्णुतक इन महादेवकी उपासना करते हैं। भगवान् श्रीराम तथा श्रीकृष्णके तो ये परमाराध्य ही हैं।
यह सर्वविदित तथ्य है कि प्राचीनकालसे ही शिवोपासनाका प्रचार-प्रसार एवं बाहुल्य मात्र भारतके सभी प्रदेशोंमें ही नहीं, अपितु न्यूनाधिकरूपसे सम्पूर्ण विश्वमें भी होता आ रहा है।
शिवके इस लोककल्याणकारी, आराध्य-स्वरूप, महत्त्व एवं उपासना-पद्धतिसे सर्वसाधारण-जनको परिचित करानेके उद्देश्यसे गीताप्रेसने सन् १९६२ ई० में ‘कल्याण’ हिन्दी-मासिक पत्रके ३६वें वर्षके विशेषांकके रूपमें ‘संक्षिप्त शिवपुराणांक’ (शिवपुराणका संक्षिप्त हिन्दी-रूपान्तर) प्रकाशित किया था, जिसे कल्याणप्रेमी पाठकों और सर्वसाधारण श्रद्धालु आस्तिक सज्जनोंने सहृदयतापूर्वक अपनाया तथा अत्यधिक पसंद किया था। इसकी बढ़ती हुई लोकप्रियता तथा निरन्तर माँगके कारण इसका बृहत्संख्यक—१,३१,००० का प्रथम संस्करण बहुत शीघ्र समाप्त हो गया। अतएव पुनः १५,००० का दूसरा संस्करण भी छापना पड़ा। उक्त विशेषांकके पुनर्मुद्रण अथवा उसे ग्रन्थाकार-रूप देनेके विषयमें जिज्ञासुओं तथा प्रेमी-सज्जनोंके उसी समयसे निरन्तर प्राप्त प्रेमाग्रहोंको ध्यानमें रखकर भगवान् आशुतोष सदाशिवकी कृपासे अब यह शिवपुराणका संक्षिप्त, सरल हिन्दी अनुवाद (केवल) भाषा ग्रन्थाकारमें मुद्रित किया गया है।
इसमें पुराणानुसार शिवतत्त्वके विशद विवेचनके साथ शिव-अवतार, महिमा तथा लीला-कथाओंके अतिरिक्त पूजा-पद्धति एवं अनेक ज्ञानप्रद आख्यान और शिक्षाप्रद गम्भीर तथा रोचक एवं प्रेरणादायी कथाओंका भी सुन्दर संयोजन है। सभी श्रद्धालु आस्तिक जनों एवं जिज्ञासु सज्जनोंको इस दुर्लभ और उपादेय ग्रन्थका अनुशीलन कर अधिकाधिक लाभ उठाना चाहिये।
—प्रकाशक
789 संक्षिप्त शिवपुराण—1 C