भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 711, कुल 850 में से

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पृष्ठ 711

* वायवीयसंहिता * ६९७

निरन्तर लोकोंकी रक्षा करती रहती है। इस विषयमें ब्रह्माजी आपको आवश्यक बातें बतायेंगे।

उस समय इस प्रकार बातचीत करती हुई देवीकी आज्ञासे ही एक सखीने उस व्याघ्रको लाकर उनके सामने खड़ा कर दिया। उसे देखकर देवी कहने लगीं—'देव ! यह व्याघ्र मैं आपके लिये भेंट लायी हूँ। आप इसे देखिये। इसके समान मेरा उपासक दूसरा कोई नहीं है। इसने दुष्ट जन्तुओंके समूहसे मेरे तपोवनकी रक्षा की थी। यह मेरा अत्यन्त भक्त है और अपने रक्षणात्मक कार्यसे मेरा विश्वासपात्र बन गया है। मेरी प्रसन्नताके लिये यह अपना देश छोड़कर यहाँ आ गया है। महेश्वर! यदि मेरे आनेसे आपको प्रसन्नता हुई है और यदि आप मुझसे अत्यन्त प्रेम करते हैं तो मैं चाहती हूँ कि यह नन्दीकी आज्ञासे मेरे अन्तःपुरके द्वारपर अन्य रक्षकोंके साथ उन्हींके चिह्न धारण करके सदा स्थित रहे।'

वायुदेव कहते हैं—देवीके इस मधुर और अन्ततोगत्वा प्रेम बढ़ानेवाले शुभ वचनको सुनकर महादेवजीने कहा—'मैं बहुत प्रसन्न हूँ।' फिर तो वह व्याघ्र उसी क्षण लचकती हुई सुवर्णजटित बेंतकी छड़ी, रत्नोंसे जटित विचित्र कवच, सर्पकी-सी आकृतिवाली छुरी तथा रक्षकोचित वेष धारण किये गणाध्यक्षके पदपर प्रतिष्ठित दिखायी दिया। उसने उमासहित महादेव और नन्दीको आनन्दित किया था। इसलिये सोमनन्दी नामसे विख्यात हुआ। इस प्रकार देवीका प्रिय कार्य करके चन्द्रार्धभूषण महादेवजीने उन्हें रत्नभूषित दिव्य आभूषणोंसे भूषित किया। चन्द्रभूषण भगवान् शिवने सर्वमनोहारिणी गिरिराजकुमारी गौरी देवीको पलंगपर बिठाकर उस समय सुन्दर अलंकारोंसे स्वयं ही उनका शृंगार किया।

(अध्याय २७)


अग्नि और सोमके स्वरूपका विवेचन तथा जगत्की अग्नीषोमात्मकताका प्रतिपादन

ऋषियोंने पूछा—प्रभो! पार्वतीदेवीका समाधान करते हुए महादेवजीने यह बात क्यों कही कि 'सम्पूर्ण विश्व अग्नीषोमात्मक एवं वागर्थात्मक है। ऐश्वर्यका सार एकमात्र आज्ञा ही है और वह आज्ञा तुम हो।' अतः इस विषयमें हम क्रमशः यथार्थ बातें सुनना चाहते हैं।

वायुदेव बोले—महर्षियो ! रुद्रदेवका जो घोर तेजोमय शरीर है, उसे अग्नि कहते हैं और अमृतमय सोम शक्तिका स्वरूप है; क्योंकि शक्तिका शरीर शान्तिकारक है। जो अमृत है, वह प्रतिष्ठा नामक कला है और जो तेज है, वह साक्षात् विद्या नामक कला है। सम्पूर्ण सूक्ष्म भूतोंमें वे ही दोनों रस और तेज हैं। तेजकी वृत्ति दो प्रकारकी है। एक सूर्यरूपा है और दूसरी अग्निरूपा। इसी तरह रसवृत्ति भी दो प्रकारकी है—एक सोमरूपिणी और दूसरी जलरूपिणी। तेज विद्युत् आदिके रूपमें उपलब्ध होता है तथा रस, मधुर आदिके रूपमें। तेज और रसके भेदोंने ही इस चराचर जगत्‌को धारण कर रखा है। अग्निसे अमृतकी उत्पत्ति होती है

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