शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
उनके तपोमय तेजको देखकर प्रसन्नचित्त हुए शम्भुने उपमन्यु मुनिको पुनः दिव्य वरदान दिया। पाशुपत-व्रत, पाशुपतज्ञान, तात्त्विक व्रतयोग तथा चिरकालतक उसके प्रवचनकी परम पटुता उन्हें प्रदान की। भगवान् शिव और शिवासे दिव्य वर तथा नित्य कुमारत्व पाकर वे प्रमुदित हो उठे। इसके बाद प्रसन्नचित्त हो प्रणाम करके हाथ जोड़ ब्राह्मण उपमन्युने देवदेव महेश्वरसे यह वर माँगा।
उपमन्यु बोले—देवदेवेश्वर! प्रसन्न होइये। परमेश्वर! प्रसन्न होइये और मुझे अपनी परम दिव्य एवं अव्यभिचारिणी भक्ति दीजिये। महादेव! मेरे जो अपने सगे-सम्बन्धी हैं, उनमें मेरी सदा श्रद्धा बनी रहनेका वर दीजिये! साथ ही, अपना दासत्व, उत्कृष्ट स्नेह और नित्य सामीप्य प्रदान कीजिये।
ऐसा कहकर प्रसन्नचित्त हुए द्विजश्रेष्ठ उपमन्युने हर्षगद्गद वाणीद्वारा महादेवजीका स्तवन किया।
उपमन्यु बोले—देवदेव! महादेव! शरणागतवत्सल! करुणासिन्धो! साम्बसदाशिव! आप सदा मुझपर प्रसन्न होइये।
वायुदेव कहते हैं—उनके ऐसा कहनेपर सबको वर देनेवाले प्रसन्नात्मा महादेवने मुनिवर उपमन्युको इस प्रकार उत्तर दिया।
शिव बोले—वत्स उपमन्यो! मैं तुमपर संतुष्ट हूँ। इसलिये मैंने तुम्हें सब कुछ दे दिया। ब्रह्मर्षे! तुम मेरे सुदृढ़ भक्त हो; क्योंकि इस विषयमें मैंने तुम्हारी परीक्षा ले ली है। तुम अजर-अमर, दुःखरहित, यशस्वी, तेजस्वी और दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न होओ। द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे बन्धु-बान्धव, कुल तथा गोत्र सदा अक्षय रहेंगे। मेरे प्रति तुम्हारी भक्ति सदा बनी रहेगी। विप्रवर! मैं तुम्हारे आश्रममें नित्य निवास करूँगा। तुम मेरे पास सानन्द विचरोगे।
ऐसा कहकर उपमन्युको अभीष्ट वर दे करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी भगवान् महेश्वर वहीं अन्तर्धान हो गये। उन श्रेष्ठ परमेश्वरसे उत्तम वर पाकर उपमन्युका हृदय प्रसन्नतासे खिल उठा। उन्हें बहुत सुख मिला और वे अपनी जन्मदायिनी माताके स्थानपर चले गये।
(अध्याय ३५)
$$\sim\sim\circ\sim\sim$$ ॥ वायवीयसंहिताका पूर्वखण्ड सम्पूर्ण ॥ $$\sim\sim\circ\sim\sim$$