शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* संक्षिप्त शिवपुराण *
आठ मूर्तियाँ हैं। महेश्वरकी इन शर्व आदि आठ मूर्तियोंसे क्रमशः भूमि, जल, अग्नि, वायु, क्षेत्रज्ञ, सूर्य और चन्द्रमा अधिष्ठित होते हैं। उनकी पृथ्वीमयी मूर्ति सम्पूर्ण चराचर जगत्को धारण करती है। उसके अधिष्ठाताका नाम शर्व है। इसलिये वह शिवकी ‘शार्बी’ मूर्ति कहलाती है। यही शास्त्रका निर्णय है। उनकी जलमयी मूर्ति समस्त जगत्के लिये जीवनदायिनी है। जल परमात्मा भवकी मूर्ति है, इसलिये उसे ‘भावी’ कहते हैं। शिवकी तेजोमयी शुभमूर्ति विश्वके बाहर-भीतर व्याप्त होकर स्थित है। उस घोररूपिणी मूर्तिका नाम रुद्र है, इसलिये वह ‘रौद्री’ कहलाती है। भगवान् शिव वायुरूपसे स्वयं गतिशील होते और इस जगत्को गतिशील बनाते हैं। साथ ही वे इसका भरण-पोषण भी करते हैं। वायु भगवान् उग्रकी मूर्ति है; इसलिये साधु पुरुष इसे ‘औग्री’ कहते है। भगवान् भीमकी आकाशरूपिणी मूर्ति सबको अवकाश देनेवाली, सर्वव्यापिनी तथा भूतसमुदायकी भेदिका है। वह भीम नामसे प्रसिद्ध है (अतः इसे ‘भैमी’ मूर्ति भी कहते हैं)। सम्पूर्ण नेत्रोंमें निवास करनेवाली तथा सम्पूर्ण आत्माओंकी अधिष्ठात्री शिव-मूर्तिको ‘पशुपति’ मूर्ति समझना चाहिये। वह पशुओंके पाशोंका उच्छेद करनेवाली है। महेश्वरकी जो ‘ईशान’ नामक मूर्ति है, वही दिवाकर (सूर्य) नाम धारण करके सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करती हुई आकाशमें विचरती है। जिनकी किरणोंमें अमृत भरा है और जो सम्पूर्ण विश्वको उस अमृतसे आप्यायित करते हैं, वे चन्द्रदेव भगवान् शिवके महादेव नामक विग्रह हैं; अतः उन्हें ‘महादेव’ मूर्ति कहते हैं। यह जो आठवीं मूर्ति है, वह परमात्मा शिवका साक्षात् स्वरूप है तथा अन्य सब मूर्तियोंमें व्यापक है। इसलिये यह सम्पूर्ण विश्व शिवरूप ही है। जैसे वृक्षकी जड़ सींचनेसे उसकी शाखाएँ पुष्ट होती हैं, उसी प्रकार भगवान् शिवकी पूजासे उनके स्वरूप-भूतजगत्का पोषण होता है। इसलिये सबको अभय दान देना, सबपर अनुग्रह करना और सबका उपकार करना—यह शिवका आराधन माना गया है। जैसे इस जगत्में अपने पुत्र-पौत्र आदिके प्रसन्न रहनेसे पिता-पितामह आदिको प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत्की प्रसन्नतासे भगवान् शंकर प्रसन्न होते हैं। यदि किसी भी देहधारीको दण्ड दिया जाता है तो उसके द्वारा अष्टमूर्तिधारी शिवका ही अनिष्ट किया जाता है, इसमें संशय नहीं है। आठ मूर्तियोंके रूपमें सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त करके स्थित हुए भगवान् शिवका तुम सब प्रकारसे भजन करो; क्योंकि रुद्रदेव सबके परम कारण हैं।
(अध्याय ३)
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शिव और शिवाकी विभूतियोंका वर्णन
श्रीकृष्णने पूछा—भगवन्! अमिततेजस्वी भगवान् शिवकी मूर्तियोंने इस सम्पूर्ण जगत्को जिस प्रकार व्याप्त कर रखा है, वह सब मैंने सुना। अब मुझे यह जाननेकी इच्छा है कि परमेश्वरी शिवा और परमेश्वर शिवका यथार्थ स्वरूप क्या है, उन