भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 748

७३४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

सके, तब उन्होंने ध्यानयोगमें स्थित होकर परमेश्वरकी स्वरूपभूता अचिन्त्य शक्तिका साक्षात्कार किया, जो अपने ही गुणोंसे—सत्त्व, रज और तमसे ढकी है तथा उन तीनों गुणोंसे परे है। परमेश्वरकी वह साक्षात् शक्ति समस्त पाशोंका विच्छेद करनेवाली है। उसके द्वारा बन्धन काट दिये जानेपर जीव अपनी दिव्य दृष्टिसे उन सर्वकारण-कारण शक्तिमान् महादेवजीका दर्शन करने लगते हैं, जो कालसे लेकर जीवात्मातक पूर्वोक्त समस्त कारणोंपर तथा सम्पूर्ण विश्वपर अपनी इस शक्तिके द्वारा ही शासन करते हैं। वे परमात्मा अप्रमेय हैं। तदनन्तर परमेश्वरके प्रसादयोग, परम-योग तथा सुदृढ़ भक्तियोगके द्वारा उन मुनियोंने दिव्य गति प्राप्त कर ली।

श्रीकृष्ण! जो अपने हृदयमें शक्ति-सहित भगवान् शिवका दर्शन करते हैं, उन्हींको सनातन शान्ति प्राप्त होती है, दूसरोंको नहीं, यह श्रुतिका कथन है। शक्तिमान्‌का शक्तिसे कभी वियोग नहीं होता। अतः शक्ति और शक्तिमान् दोनोंके तादात्म्यसे परमानन्दकी प्राप्ति होती है। मुक्तिकी प्राप्तिमें निश्चय ही ज्ञान और कर्मका कोई क्रम विवक्षित नहीं है, जब शिव और शक्तिकी कृपा हो जाती है, तब वह मुक्ति हाथमें आ जाती है। देवता, दानव, पशु, पक्षी तथा कीड़े-मकोड़े भी उनकी कृपासे मुक्त हो जाते हैं। गर्भका बच्चा, जन्मता हुआ बालक, शिशु, तरुण, वृद्ध, मुमूर्षु, स्वर्गवासी, नारकी, पतित, धर्मात्मा, पण्डित अथवा मूर्ख साम्बशिवकी कृपा होनेपर तत्काल मुक्त हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है। परमेश्वर अपनी स्वाभाविक करुणासे अयोग्य भक्तोंके भी विविध मलोंको दूर करके उनपर कृपा करते हैं, इसमें सन्देह नहीं है। भगवान्‌की कृपासे ही भक्ति होती है और भक्तिसे ही उनकी कृपा होती है। अवस्थाभेदका विचार करके विद्वान् पुरुष इस विषयमें मोहित नहीं होता है। कृपाप्रसादपूर्वक जो यह भक्ति होती है, वह भोग और मोक्ष दोनोंकी प्राप्ति करानेवाली है। उसे मनुष्य एक जन्ममें नहीं प्राप्त कर सकता। अनेक जन्मोंतक श्रौत-स्मार्त कर्मोंका अनुष्ठान करके सिद्ध हुए विरक्त एवं ज्ञानसम्पन्न पुरुषोंपर महेश्वर प्रसन्न होते और कृपा करते हैं। देवेश्वर शिवके प्रसन्न होनेपर उस पशु (जीव)-में बुद्धिपूर्वक थोड़ी-सी भक्तिका उदय होता है। तब वह यह अनुभव करने लगता है कि भगवान् शिव मेरे स्वामी हैं। फिर तपस्यापूर्वक वह नाना प्रकारके शैवधर्मोंके पालनमें संलग्न होता है। उन धर्मोंके पालनमें बारंबार लगे रहनेसे उसके हृदयमें पराभक्तिका प्रादुर्भाव होता है। उस पराभक्तिसे परमेश्वरका परम प्रसाद उपलब्ध होता है। प्रसादसे सम्पूर्ण पापोंसे छुटकारा मिलता है और छुटकारा मिल जानेपर परमानन्दकी प्राप्ति होती है, जिस मनुष्यका भगवान् शिवमें थोड़ा-सा भी भक्तिभाव है, वह तीन जन्मोंके बाद अवश्य मुक्त हो जाता है। उसे इस संसारमें योनियन्त्रकी पीड़ा नहीं सहनी पड़ती। सांगा (अंगसहित) और अनंगा (अंगरहित) जो सेवा है, उसीको भक्ति कहते हैं। उसके फिर तीन भेद होते हैं—मानसिक, वाचिक और शारीरिक। शिवके रूप आदिका जो चिन्तन है, उसे मानसिक सेवा कहते हैं। जप आदि वाचिक सेवा है और पूजन आदि कर्म