भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 757

* वायवीयसंहिता * ७४३

शिवलिंग-पूजन, दान, ईश्वर-प्रेम, सदा और सर्वत्र दया, सत्य-भाषण, सन्तोष, आस्तिकता, किसी भी जीवकी हिंसा न करना, लज्जा, श्रद्धा, अध्ययन, योग, निरन्तर अध्यापन, व्याख्यान, ब्रह्मचर्य, उपदेश-श्रवण, तपस्या, क्षमा, शौच, शिखा-धारण, यज्ञोपवीत-धारण, पगड़ी धारण करना, दुपट्टा लगाना, निषिद्ध वस्तुका सेवन न करना, रुद्राक्षकी माला पहनना, प्रत्येक पर्वमें विशेषतः चतुर्दशीको शिवकी पूजा करना, ब्रह्मकूर्चका* पान, प्रत्येक मासमें ब्रह्मकूर्चसे विधिपूर्वक मुझे नहलाकर मेरा विशेषरूपसे पूजन करना, सम्पूर्ण क्रियान्नका त्याग, श्राद्धान्नका परित्याग, बासी अन्न तथा विशेषतः यावक (कुलथी या बोरो धान)-का त्याग, मद्य और मद्यकी गन्धका त्याग, शिवको निवेदित (चण्डेश्वरके भाग) नैवेद्यका त्याग— ये सभी वर्णोंके सामान्य धर्म हैं। ब्राह्मणोंके लिये विशेष धर्म ये हैं—क्षमा, शान्ति,


* पाराशरस्मृतिके ग्यारहवें अध्यायमें ब्रह्मकूर्चका वर्णन इस प्रकार है—

गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम्। निर्दिष्टं पञ्चगव्यं च पवित्रं पापशोधनम्॥ २९॥
गोमूत्रं कृष्णवर्णायाः श्वेतायाश्चैव गोमयम्। पयश्च ताम्रवर्णाया रक्ताया गृह्यते दधि॥ ३०॥
कपिलाया घृतं ग्राह्यं सर्वं कापिलमेव वा। मूत्रमेकपलं दद्यादङ्गुष्ठार्द्धं तु गोमयम्॥ ३१॥
क्षीरं सप्तपलं दद्याद्दधि त्रिपलमुच्यते। घृतमेकपलं दद्यात् पलमेकं कुशोदकम्॥ ३२॥
गायत्र्याऽऽदाय गोमूत्रं गन्धद्वारेति गोमयम्। आप्यायस्वेति च क्षीरं दधिक्राव्णस्तथा दधि॥ ३३॥
तेजोऽसि शुक्रमित्याज्यं देवस्य त्वा कुशोदकम्। पञ्चगव्यमृचापूतं स्थापयेदग्निसंनिधौ॥ ३४॥
आपो हि ष्ठेति चालोढ्य मा नस्तोकेति मन्त्रयेत्। सप्तावरास्तु ये दर्भा अच्छिन्नाग्राः शुकत्विषः॥ ३५॥
एतैरुद्धृत्य होतव्यं पञ्चगव्यं यथाविधि। इरावती इदं विष्णुर्मा नस्तोकेति शंवती॥ ३६॥
एताभिश्चैव होतव्यं हुतशेषं पिबेद् द्विजः। आलोढ्य प्रणवेनैव निर्मथ्य प्रणवेन तु॥ ३७॥
उद्धृत्य प्रणवेनैव पिबेच्च प्रणवेन तु। यत्त्वगस्थिगतं पापं देहे तिष्ठति देहिनाम्॥ ३८॥
ब्रह्मकूर्चं दहेत्सर्वं यथैवाग्निरिवेन्धनम्। पवित्रं त्रिषु लोकेषु देवताभिरधिष्ठितम्॥ ३९॥

‘गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी और कुशाका जल—ये पवित्र और पापनाशक ‘पंचगव्य’ कहे जाते हैं। (कुशोदकमिश्रित पंचगव्य ही ब्रह्मकूर्च कहलाता है।) ब्रह्मकूर्चका विधान करनेवालेको उचित है कि काली गौका गोमूत्र, सफेद गौका गोबर, ताँबेके रंगकी गौका दूध, लाल गौका दही और कपिला गौका घी अथवा कपिला गौका ही गोमूत्र आदि पाँचों वस्तु लाये; १ पल गोमूत्र, आधे अँगूठे भर गोबर, ७ पल दूध, ३ पल दही, १ पल घी और १ पल कुशाका जल ग्रहण करे। ‘गायत्री’ मन्त्रसे गोमूत्र, ‘गन्धद्वारा’ मन्त्रसे गोबर, ‘आप्यायस्व’ मन्त्रसे दूध, ‘दधिक्राव्ण’ मन्त्रसे दही, ‘तेजोऽसि शुक्र’ मन्त्रसे घी और ‘देवस्य त्वा’ मन्त्रसे कुशाका जल ग्रहण करे; इस प्रकार ऋचाओंसे पवित्र किये हुए पंचगव्यको अग्निके पास रखे। ‘आपो हि ष्ठा’ मन्त्रसे गोमूत्र आदिको चलाये, ‘मा नस्तोके’ मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे (मथे) ‘इरावती’, ‘इदं विष्णुः’, ‘मा नस्तोके’ और ‘शंवती’ इन ऋचाओंन्द्वारा अग्रभागसे युक्त ७ हरित कुशाओंसे पंचगव्यका होम करे; होमसे बचे हुए पंचगव्यको ओंकार पढ़कर मिलाये, ओंकार उच्चारण करके मथे, ओंकार पढ़कर उठाये और ओंकार उच्चारण करके द्विज पीवे। जैसे अग्नि काठको जलाता है, वैसे ही ब्रह्मकूर्च मनुष्योंके त्वचों और हड्डियोंमें टिके हुए पापोंको जला देता है। देवताओंसे अधिष्ठित होनेके कारण ब्रह्मकूर्च तीनों लोकोंमें पवित्र हुआ है॥ २९—३९॥