भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७५२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

(असमर्थ) नहीं हो गये हैं, उनके लिये सब शास्त्रोंमें मैंने ही नियम बनाया है, उस नियमका उन्हें पालन करना चाहिये। अब मैं पहले मन्त्रकी दीक्षा लेनेका शुभ विधान बता रहा हूँ, जिसके बिना मन्त्र-जप निष्फल होता है और जिसके होनेसे जप-कर्म अवश्य सफल होता है।

(अध्याय १३)


गुरुसे मन्त्र लेने तथा उसके जप करनेकी विधि, पाँच प्रकारके जप तथा उनकी महिमा, मन्त्रगणनाके लिये विभिन्न प्रकारकी मालाओंका महत्त्व तथा अंगुलियोंके उपयोगका वर्णन, जपके लिये उपयोगी स्थान तथा दिशा, जपमें वर्जनीय बातें, सदाचारका महत्त्व, आस्तिकताकी प्रशंसा तथा पंचाक्षर-मन्त्रकी विशेषताका वर्णन

(महादेवजी कहते हैं—) वरानने! आज्ञाहीन, क्रियाहीन, श्रद्धाहीन तथा विधिके पालनार्थ आवश्यक दक्षिणासे हीन जो जप किया जाता है, वह सदा निष्फल होता है। मेरा स्वरूपभूत मन्त्र यदि आज्ञासिद्ध, क्रियासिद्ध और श्रद्धासिद्ध होनेके साथ ही दक्षिणासे भी युक्त हो तो उसकी सिद्धि होती है और उससे महान् फल प्राप्त होता है। शिष्यको चाहिये कि वह पहले तत्त्ववेत्ता आचार्य, जपशील, सद्गुणसम्पन्न, ध्यान-योगपरायण एवं ब्राह्मण गुरुकी सेवामें उपस्थित हो, मनमें शुद्धभाव रखते हुए प्रयत्नपूर्वक उन्हें संतुष्ट करे। ब्राह्मण साधक अपने मन, वाणी, शरीर और धनसे आचार्यका पूजन करे। वह वैभव हो तो गुरुको भक्तिभावसे हाथी, घोड़े, रथ, रत्न, क्षेत्र और गृह आदि अर्पित करे। जो अपने लिये सिद्धि चाहता हो, वह धनके दानमें कृपणता न करे। तदनन्तर सब सामग्रियों-सहित अपने-आपको गुरुकी सेवामें अर्पित कर दे।

इस प्रकार यथाशक्ति निष्छलभावसे गुरुकी विधिवत् पूजा करके गुरुसे मन्त्र एवं ज्ञानका उपदेश क्रमशः ग्रहण करे। इस तरह संतुष्ट हुए गुरु अपने पूजक शिष्यको, जो एक वर्षतक उनकी सेवामें रह चुका हो, गुरुकी सेवामें उत्साह रखनेवाला हो, अहंकाररहित हो और उपवासपूर्वक स्नान करके शुद्ध हो गया हो, पुनः विशेष शुद्धिके लिये पूर्ण कलशमें रखे हुए पवित्र द्रव्ययुक्त मन्त्रशुद्ध जलसे नहलाकर चन्दन, पुष्पमाला, वस्त्र और आभूषणोंद्वारा अलंकृत करके उसे सुन्दर वेश-भूषासे विभूषित करे। तत्पश्चात् शिष्यसे ब्राह्मणोंद्वारा पुण्याह-वाचन और ब्राह्मणोंकी पूजा करवाकर समुद्रतटपर, नदीके किनारे, गोशालामें, देवालयमें, किसी भी पवित्र स्थानमें अथवा घरमें सिद्धिदायक काल आनेपर शुभ तिथि, शुभ नक्षत्र एवं सर्वदोषरहित शुभ योगमें गुरु अपने उस शिष्यको अनुग्रहपूर्वक विधिके अनुसार मेरा ज्ञान दे। एकान्त स्थानमें अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो उच्चस्वरसे हम दोनोंके उस उत्तम मन्त्रका शिष्यसे भलीभाँति उच्चारण कराये। बारंबार उच्चारण कराकर