शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* वायवीयसंहिता * ७६१
आराधना करके उसके मस्तकपर शिवका वरद हाथ रखे। 'मैं शिव हूँ' इस अभिमानसे युक्त गुरु शिवके तेजसे सम्पन्न अपने हाथको शिष्यके मस्तकपर रखे और शिवमन्त्रका उच्चारण करे। उसी हाथसे वह शिष्यके सम्पूर्ण अंगोंका स्पर्श करे। शिष्य भी आचार्यरूपमें उपस्थित हुए ईश्वरको पृथ्वीपर गिरकर साष्टांग प्रणाम करे। तदनन्तर जब शिष्य शिवाग्निमें महादेवजीकी विधिवत् पूजा करके तीन आहुति दे ले, तब गुरु पुनः पूर्ववत् शिष्यको अपने पास बिठा ले। कुशोंके अग्रभागसे उसका स्पर्श करते हुए विद्या या मन्त्रद्वारा अपने-आपको उसके भीतर आविष्ट करे।
तत्पश्चात् महादेवजीको प्रणाम करके नाड़ी-संधान करे। फिर शिव-शास्त्रमें बताये हुए मार्गसे प्राणका निष्क्रमण करके शिष्यके शरीरमें प्रवेशकी भावना करे, साथ ही मन्त्रोंका तर्पण भी करे। मूलमन्त्रके तर्पणके लिये उसीके उच्चारणपूर्वक दस आहुतियाँ देनी चाहिये। फिर अंगोंके तर्पणके लिये अंग-मन्त्रोंद्वारा ही क्रमशः तीन आहुतियाँ दे। इसके बाद पूर्णाहुति देकर मन्त्रवेत्ता गुरु प्रायश्चित्तके निमित्त मूलमन्त्रसे पुनः दस आहुतियाँ अग्निमें डाले। फिर देवेश्वर शिवका पूजन करके सम्यक् आचमन और हवन करनेके पश्चात् यथोचित रीतिसे जातितः वैश्यका उद्धार करे। भावनाद्वारा उसके वैश्यत्वको निकालकर उसमें क्षत्रियत्वकी उत्पत्ति करे। फिर इसी तरह क्षत्रियत्वका भी उद्धार करके गुरु उसमें ब्राह्मणत्वकी उद्भावना करे। इसी प्रणालीसे जातितः क्षत्रियका भी उद्धार करके ब्राह्मण बनाये। फिर उन दोनों शिष्योंमें रुद्रत्वकी उत्पत्ति करे। जो जातिसे ही ब्राह्मण है, उस शिष्यमें केवल रुद्रत्वकी ही स्थापना करे। फिर शिष्यका प्रोक्षण और ताड़न करके उसके आगकी चिनगारियोंके समान प्रकाशमान शिवस्वरूप आत्माको अपने आत्मामें स्थित होनेकी भावना करे। तदनन्तर पूर्वोक्त नाड़ीसे गुरु-मन्त्रोच्चारणपूर्वक वायुका रेचन (निःसारण) करे। वायुका निःसारण करके उस नाड़ीके द्वारा ही शिष्यके हृदयमें वह स्वयं प्रवेश करे। प्रवेश करके उसके चैतन्यका नील बिन्दुके समान चिन्तन करे। साथ ही यह भावना करे कि मेरे तेजसे इसका सारा मल नष्ट हो गया और यह पूर्णतः प्रकाशित हो रहा है। इसके बाद उस जीव-चैतन्यको लेकर नाड़ीसे संहारमुद्रा एवं पूरक प्राणायामद्वारा अपने आत्मासे एकीभूत करनेके लिये उसमें निविष्ट करे। फिर रेचककी ही भाँति कुम्भकद्वारा उसी नाड़ीसे उस जीव-चैतन्यको वहाँसे लेकर शिष्यके हृदयमें स्थापित कर दे। तत्पश्चात् शिष्यका स्पर्श करके शिवसे उपलब्ध हुए यज्ञोपवीतको उसे देकर गुरु तीन बार आहुति दे पूर्णाहुति होम करे। इसके बाद आराध्यदेवके दक्षिणभागमें शिष्यको कुश तथा फूलसे आच्छादित करके श्रेष्ठ आसनपर बिठाकर उसका मुँह उत्तरकी ओर करके उसे स्वस्तिकासनमें स्थित करे। शिष्य गुरुकी ओर हाथ जोड़े रहे। गुरु स्वयं पूर्वाभिमुख हो एक श्रेष्ठ आसनपर खड़ा रहे और पहलेसे ही स्थापन-पूर्वक सिद्ध किये हुए पूर्ण घटको लेकर शिवका ध्यान करते हुए मन्त्रपाठ तथा मांगलिक वाद्योंकी ध्वनिके साथ शिष्यका अभिषेक करे। तदनन्तर शिष्य उस