शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ७७४ | * संक्षिप्त शिवपुराण * |
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छोड़े। पाद्यपात्रमें खश और चन्दन छोड़ना चाहिये। आचमनीयपात्रमें विशेषतः जायफल, कंकौल, कपूर, सहिजन और तमालका चूर्ण करके डालना चाहिये। इलायची सभी पात्रोंमें डालनेकी वस्तु है। कपूर, चन्दन, कुशाग्रभाग, अक्षत, जौ, धान, तिल, घी, सरसों, फूल और भस्म—इन सबको अर्घ्यपात्रमें छोड़ना चाहिये। कुश, फूल, जौ, धान, सहिजन, तमाल और भस्म—इन सबका प्रोक्षणीपात्रमें प्रक्षेपण करना चाहिये। सर्वत्र मन्त्र-न्यास करके कवच-मन्त्रसे प्रत्येक पात्रको बाहरसे आवेष्टित करे। तत्पश्चात् अस्त्र-मन्त्रसे उसकी रक्षा करके धेनुमुद्रा दिखाये। पूजाके सभी द्रव्योंका प्रोक्षणीपात्रके जलसे मूलमन्त्रद्वारा प्रोक्षण करके विधिवत् शोधन करे। श्रेष्ठ साधकको चाहिये कि अधिक पात्रोंके न मिलनेपर सब कर्मोंमें एकमात्र प्रोक्षणीपात्रको ही सम्पादित करके रखे और उसीके जलसे सामान्यतः अर्घ्य आदि दे। तत्पश्चात् मण्डपके दक्षिण द्वारभागमें भक्ष्य-भोज्य आदिके क्रमसे विधिपूर्वक विनायकदेवकी पूजा करके अन्तःपुरके स्वामी साक्षात् नन्दीकी भलीभाँति पूजा करे। उनकी अंगकान्ति सुवर्णमय पर्वतके समान है। समस्त आभूषण उसकी शोभा बढ़ाते हैं। मस्तकपर बालचन्द्रका मुकुट सुशोभित होता है। उनकी मूर्ति सौम्य है। वे तीन नेत्र और चार भुजाओंसे युक्त हैं। उनके एक हाथमें चमचमाता हुआ त्रिशूल, दूसरेमें मृगी, तीसरेमें टंक और चौथेमें तीखा बेंत है। उनके मुखकी कान्ति चन्द्रमण्डलके समान उज्ज्वल है। मुख वानरके सदृश है।
द्वारके उत्तर पार्श्वमें उनकी पत्नी सुयशा हैं, जो मरुद्गणोंकी कन्या हैं। वे उत्तम व्रतका पालन करनेवाली हैं और पार्वतीजीके चरणोंका श्रृंगार करनेमें लगी रहती हैं। उनका पूजन करके परमेश्वर शिवके भवनके भीतर प्रवेश करे और उन द्रव्योंसे शिवलिंगका पूजन करके निर्माल्यको वहाँसे हटा ले। तदनन्तर फूल धोकर शिवलिंगके मस्तकपर उसकी शुद्धिके लिये रखे। फिर हाथमें फूल ले यथाशक्ति मन्त्रका जप करे। इससे मन्त्रकी शुद्धि होती है। ईशानकोणमें चण्डीकी आराधना करके उन्हें पूर्वोक्त निर्माल्य अर्पित करे। तत्पश्चात् इष्टदेवके लिये आसनकी कल्पना करे। क्रमशः आधार आदिका ध्यान करे—कल्याणमयी आधार-शक्ति भूतलपर विराजमान हैं और उनकी अंगकान्ति श्याम है। इस प्रकार उनके स्वरूपका चिन्तन करे। उनके ऊपर फन उठाये सर्पाकार अनन्त बैठे हैं, जिनकी अंगकान्ति उज्ज्वल है। वे पाँच फनोंसे युक्त हैं और आकाशको चाटते हुए-से जान पड़ते हैं। अनन्तके ऊपर भद्रासन है, जिसके चारों पायोंमें सिंहकी आकृति बनी हुई है। वे चारों पाये क्रमशः धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यरूप हैं। धर्म नामवाला पाया आग्नेय-कोणमें है और उसका रंग सफेद है। ज्ञान नामक पाया नैर्ऋत्यकोणमें है और उसका रंग लाल है। वैराग्य वायव्यकोणमें है और उसका रंग पीला है तथा ऐश्वर्य ईशान-कोणमें है और उसका वर्ण श्याम है। अधर्म आदि उस आसनके पूर्वादि भागोंमें क्रमशः स्थित हैं अर्थात् अधर्म पूर्वमें, अज्ञान दक्षिणमें, अवैराग्य पश्चिममें और अनैश्वर्य उत्तरमें हैं। इनके अंग राजावर्त मणिके