भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* संक्षिप्त शिवपुराण *

महाभुज महासार महागुण महाकथ।
महाबल महामाय महारस महारथ॥ ९॥
महाबाहो! महासार! महागुण! महती कीर्तिकथासे युक्त! महाबली! महामायावी! महान् रसिक तथा महारथ! आपकी जय हो॥ ९॥

नमः परमदेवाय नमः परमहेतवे।
नमः शिवाय शान्ताय नमः शिवतराय ते॥ १०॥
आप परम आराध्यको नमस्कार है। आप परम कारणको नमस्कार है। शान्त शिवको नमस्कार है और आप परम कल्याणमय प्रभुको नमस्कार है॥ १०॥

त्वदधीनमिदं कृत्स्नं जगद्धि ससुरासुरम्॥ ११॥
अतस्त्वद्विहितामाज्ञां क्षमते कोऽतिवर्तितुम्॥ १२॥
देवताओं और असुरोंसहित यह सम्पूर्ण जगत् आपके अधीन है। अतः आपकी आज्ञाका उल्लंघन करनेमें कौन समर्थ हो सकता है॥ ११-१२॥

अयं पुनर्जनो नित्य भवदेकसमाश्रयः।
भवन्तोऽनुगृह्णास्मै प्रार्थितं सम्प्रयच्छतु॥ १३॥
हे सनातनदेव! यह सेवक एकमात्र आपके ही आश्रित है; अतः आप इसपर अनुग्रह करके इसे इसकी प्रार्थित वस्तु प्रदान करें॥ १३॥

जयाम्बिके जगन्मातर्जय सर्वजगन्मयि।
जयानवधिकैश्वर्ये जयानुपमविग्रहे॥ १४॥
अम्बिके! जगन्मातः! आपकी जय हो। सर्वजगन्मयी! आपकी जय हो। असीम ऐश्वर्यशालिनि! आपकी जय हो। आपके श्रीविग्रहकी कहीं उपमा नहीं है, आपकी जय हो॥ १४॥

जय वाङ्मनसातीते जयाचिद्ध्वान्तभञ्जिके।
जय जन्मजराहीने जय कालोत्तरोत्तरे॥ १५॥
मन, वाणीसे अतीत शिवे! आपकी जय हो। अज्ञानान्धकारका भंजन करनेवाली देवि! आपकी जय हो। जन्म और जरासे रहित उमे! आपकी जय हो। कालसे भी अतिशय उत्कृष्ट शक्तिवाली दुर्गे! आपकी जय हो॥ १५॥

जयानेकविधानस्थे जय विश्वेश्वरप्रिये।
जय विश्वसुराराध्ये जय विश्वविजृम्भिणि॥ १६॥
अनेक प्रकारके विधानोंमें स्थित परमेश्वरि! आपकी जय हो। विश्वनाथप्रिये! आपकी जय हो। समस्त देवताओंकी आराधनीया देवि! आपकी जय हो। सम्पूर्ण विश्वका विस्तार करनेवाली जगदम्बिके! आपकी जय हो॥ १६॥

जय मङ्गलदिव्याङ्गि जय मङ्गलदीपिके।
जय मङ्गलचारित्रे जय मङ्गलदायिनि॥ १७॥
मंगलमय दिव्य अंगोंवाली देवि! आपकी जय हो। मंगलको प्रकाशित करनेवाली! आपकी जय हो। मंगलमय चरित्रवाली सर्वमंगले! आपकी जय हो। मंगलदायिनि! आपकी जय हो॥ १७॥

नमः परमकल्याणगुणसंचयमूर्तये।
त्वत्तः खलु समुत्पन्नं जगत्त्वय्येव लीयते॥ १८॥
परम कल्याणमय गुणोंकी आप मूर्ति हैं, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत् आपसे ही उत्पन्न हुआ है, अतः आपमेंही लीन होगा॥ १८॥

त्वद्विनान्तः फलं दातुमीश्वरोऽपि न शक्नुयात्।
जन्मप्रभृति देवेशि जनोऽयं त्वदुपाश्रितः॥ १९॥
अतोऽस्य तव भक्तस्य निर्वर्तय मनोरथम्।
देवेश्वरि! अतः आपके बिना ईश्वर भी फल देनेमें समर्थ नहीं हो सकते। यह जन जन्मकालसे ही आपकी शरणमें आया हुआ है। अतः देवि! आप अपने इस भक्तका मनोरथ सिद्ध कीजिये॥ १९॥