शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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शिवचरणार्चनपरायण, शिवके बीजोंमें प्रथम और कलाओंमें चार कलाओंसे युक्त है, मैंने पूर्वदिशामें भक्तिभावसे शक्तिसहित जिसका पूजन किया है, वह पवित्र परब्रह्म शिव मेरी प्रार्थना सफल करे॥ ३०–३२॥
अञ्जनादिप्रतीकाशमघोरं घोरविग्रहम्।
देवस्य दक्षिणं वक्त्रं देवदेवपदार्चकम्॥ ३३॥
विद्यापदं समारूढं वह्निमण्डलमध्यगम्।
द्वितीयं शिवबीजेषु कलास्वष्टकलान्वितम्॥ ३४॥
शम्भोर्दक्षिणदिग्भागे शक्त्या सह समर्चितम्।
पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु॥ ३५॥
जो अंजन आदिके समान श्याम, घोर शरीरवाला एवं अघोर नामसे प्रसिद्ध है, महादेवजीके दक्षिण मुखका अभिमानी तथा देवाधिदेव शिवके चरणोंका पूजक है, विद्याकलापर आरूढ़ और अग्निमण्डलके मध्य विराजमान है, शिवबीजोंमें द्वितीय तथा कलाओंमें अष्टकलायुक्त एवं भगवान् शिवके दक्षिणभागमें शक्तिके साथ पूजित है, वह पवित्र परब्रह्म मुझे मेरी अभीष्ट वस्तु प्रदान करे॥ ३३–३५॥
कुङ्कुमक्षोदसंकाशं वामाख्यं वरवेषधृक्।
वक्त्रमुत्तरमीशस्य प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठितम्॥ ३६॥
वारिमण्डलमध्यस्थं महादेवार्चने रतम्।
तुरीयं शिवबीजेषु त्रयोदशकलान्वितम्॥ ३७॥
देवस्योत्तरदिग्भागे शक्त्या सह समर्चितम्।
पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु॥ ३८॥
जो कुंकुमचूर्ण अथवा केसरयुक्त चन्दनके समान रक्त-पीतवर्णवाला, सुन्दर वेषधारी और वामदेव नामसे प्रसिद्ध है, भगवान् शिवके उत्तरवर्ती मुखका अभिमानी है, प्रतिष्ठाकलामें प्रतिष्ठित है, जलके मण्डलमें विराजमान तथा महादेवजीकी अर्चनामें तत्पर है, शिवबीजोंमें चतुर्थ तथा तेरह कलाओंसे युक्त है और महादेवजीके उत्तरभागमें शक्तिके साथ पूजित हुआ है, वह पवित्र परब्रह्म मेरी प्रार्थना पूर्ण करे॥ ३६–३८॥
शङ्खकुन्देन्दुधवलं सद्याख्यं सौम्यलक्षणम्।
शिवस्य पश्चिमं वक्त्रं शिवपादार्चने रतम्॥ ३९॥
निवृत्तिपदनिष्ठं च पृथिव्यां समवस्थितम्।
तृतीयं शिवबीजेषु कलाभिश्चाष्टभिर्युतम्॥ ४०॥
देवस्य पश्चिमे भागे शक्त्या सह समर्चितम्।
पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु॥ ४१॥
जो शंख, कुन्द और चन्द्रमाके समान धवल, सौम्य तथा सद्योजात नामसे विख्यात है, भगवान् शिवके पश्चिम मुखका अभिमानी एवं शिवचरणोंकी अर्चनामें रत है, निवृत्तिकलामें प्रतिष्ठित तथा पृथ्वीमण्डलमें स्थित है, शिवबीजोंमें तृतीय, आठ कलाओंसे युक्त और महादेवजीके पश्चिमभागमें शक्तिके साथ पूजित हुआ है, वह पवित्र परब्रह्म मुझे मेरी प्रार्थित वस्तु दे॥ ३९–४१॥
शिवस्य तु शिवायाश्च हृन्मूर्ती शिवभाविते।
तयोराज्ञां पुरस्कृत्य ते मे कामं प्रयच्छताम्॥ ४२॥
शिव और शिवाकी हृदयरूपी मूर्तियाँ शिवभावसे भावित हो उन्हीं दोनोंकी आज्ञा शिरोधार्य करके मेरा मनोरथ पूर्ण करें॥ ४२॥
शिवस्य च शिवायाश्च शिखामूर्ती शिवाश्रिते।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां ते मे कामं प्रयच्छताम्॥ ४३॥
शिव और शिवाकी शिखारूपा मूर्तियाँ शिवके ही आश्रित रहकर उन दोनोंकी आज्ञाका आदर करके मुझे मेरी अभीष्ट वस्तु प्रदान करें॥ ४३॥