भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८०८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

प्रकार शक्तिविद्या (ॐ नमः शिवायै)-का जप करके उसका समर्पण करे और महादेवजीसे क्षमा माँगकर शेष पूजाकी समाप्ति करे॥ १७९-१८०॥

एतत्पुण्यतमं स्तोत्रं शिवयोर्हृदयंगमम्।
सर्वाभीष्टप्रदं साक्षाद्भक्तिमुक्त्येकसाधनम्॥ १८१॥

यह परम पुण्यमय स्तोत्र शिव और शिवाके हृदयको अत्यन्त प्रिय है, सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला है और भोग तथा मोक्षका एकमात्र साक्षात् साधन है॥ १८१॥

य इदं कीर्तयेन्नित्यं शृणुयाद्वा समाहितः।
स विधूयाशु पापानि शिवसायुज्यमाप्नुयात्॥ १८२॥

जो एकाग्रचित्त हो प्रतिदिन इसका कीर्तन अथवा श्रवण करता है, वह सारे पापोंको शीघ्र ही धो-बहाकर भगवान् शिवका सायुज्य प्राप्त कर लेता है॥ १८२॥

गोघ्नश्चैव कृतघ्नश्च वीरहा भ्रूणहापि वा।
शरणागतघाती च मित्रविश्रम्भघातकः॥ १८३॥
दुष्टपापसमाचारो मातृहा पितृहापि वा।
स्तवेनानेन जप्तेन तत्तत्पापात् प्रमुच्यते॥ १८४॥

जो गोहत्यारा, कृतघ्न, वीरघाती, गर्भस्थ शिशुकी हत्या करनेवाला, शरणागतका वध करनेवाला और मित्रके प्रति विश्वासघाती है, दुराचार और पापाचारमें ही लगा रहता है तथा माता और पिताका भी घातक है, वह भी इस स्तोत्रके जपसे तत्काल पाप-मुक्त हो जाता है॥ १८३-१८४॥

दुःस्वप्नादिमहानर्थसूचकेषु भयेषु च।
यदि संकीर्तयेदेतन्न ततोऽनर्थभागभवेत्॥ १८५॥

दुःस्वप्न आदि महान् अनर्थसूचक भयोंके उपस्थित होनेपर यदि मनुष्य इस स्तोत्रका कीर्तन करे तो वह कदापि अनर्थका भागी नहीं हो सकता॥ १८५॥

आयुरारोग्यमैश्वर्यं यच्चान्यदपि वाञ्छितम्।
स्तोत्रस्यास्य जपे तिष्ठंस्तत्सर्वं लभते नरः॥ १८६॥

आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य तथा और जो भी मनोवांछित वस्तु है, उन सबको इस स्तोत्रके जपमें संलग्न रहनेवाला पुरुष प्राप्त कर लेता है॥ १८६॥

असम्पूज्य शिवं स्तोत्रजपात्फलमुदाहृतम्।
सम्पूज्य च जपे तस्य फलं वक्तुं न शक्यते॥ १८७॥

शिवकी पूर्वोक्त पूजा न करके केवल स्तोत्रका पाठ करनेसे जो फल मिलता है, उसको यहाँ बताया गया है; परंतु शिवकी पूजा करके इस स्तोत्रका पाठ करनेसे जो फल मिलता है, उसका तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता॥ १८७॥

आस्तामियं फलावाप्तिरस्मिन् संकीर्तिते सति।
सार्धमम्बिकया देवः श्रुत्वैव दिवि तिष्ठति॥ १८८॥
तस्मान्नभसि सम्पूज्य देवदेवं सहोमया।
कृताञ्जलिपुटस्तिष्ठन् स्तोत्रमेतदुदीरयेत्॥ १८९॥

यह फलकी प्राप्ति अलग रहे, इस स्तोत्रका कीर्तन करनेपर इसे सुनते ही माता पार्वतीसहित महादेवजी आकाशमें आकर खड़े हो जाते हैं। अतः उस समय उमासहित देवदेव महादेवकी आकाशमें पूजा करके दोनों हाथ जोड़ खड़ा हो जाय और इस स्तोत्रका पाठ करे॥ १८८-१८९॥

(अध्याय ३१)