शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 836, कुल 850 में से
संदर्भ में पढ़ें८२२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
अधिक भोजन कर लिया गया हो या अधिक परिश्रमके कारण थकावट हुई हो, जब मनुष्य अत्यन्त चिन्तासे व्याकुल हो, अधिक भूख-प्यास सता रही हो तथा जब वह अपने गुरुजनोंके कार्य आदिमें लगा हुआ हो, उस अवस्थामें भी उसे योगाभ्यास नहीं करना चाहिये।
जिसके आहार-विहार उचित एवं परिमित हों, जो कर्मोंमें यथायोग्य समुचित चेष्टा करता हो तथा जो उचित समयसे सोता और जागता हो एवं सर्वथा आयासरहित हो, उसीको योगाभ्यासमें तत्पर होना चाहिये। आसन मुलायम, सुन्दर, विस्तृत, सब ओरसे बराबर और पवित्र होना चाहिये। पद्मासन और स्वस्तिकासन आदि जो यौगिक आसन हैं, उनपर भी अभ्यास करना चाहिये। अपने आचार्यपर्यन्त गुरुजनोंकी परम्पराको क्रमशः प्रणाम करके अपनी गर्दन, मस्तक और छातीको सीधी रखे। ओठ और नेत्र अधिक सटे हुए न हों। सिर कुछ-कुछ ऊँचा हो। दाँतोंसे दाँतोंका स्पर्श न करे। दाँतोंके अग्रभागमें स्थित हुई जिह्वाको अविचलभावसे रखते हुए, एड़ियोंसे दोनों अण्डकोशों और प्रजननेन्द्रियकी रक्षापूर्वक दोनों जाँघोंके ऊपर बिना किसी यत्नके अपनी दोनों भुजाओंको रखे। फिर दाहिने हाथके पृष्ठभागको बायें हाथकी हथेलीपर रखकर धीरेसे पीठको ऊँची करे और छातीको आगेकी ओरसे सुस्थिर रखते हुए नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाये। अन्य दिशाओंकी ओर दृष्टिपात न करे। प्राणका संचार रोककर पाषाणके समान निश्चल हो जाय। अपने शरीरके भीतर मानस-मन्दिरमें हृदय-कमलके आसनपर पार्वतीसहित भगवान् शिवका चिन्तन करके ध्यान-यज्ञके द्वारा उनका पूजन करे।
मूलाधार चक्रमें, नासिकाके अग्रभागमें, नाभिमें, कण्ठमें, तालुके दोनों छिद्रोंमें, भौंहोंके मध्यभागमें, द्वारदेशमें, ललाटमें या मस्तकमें शिवका चिन्तन करे। शिवा और शिवके लिये यथोचित रीतिसे उत्तम आसनकी कल्पना करके वहाँ सावरण या निरावरण शिवका स्मरण करे। द्विदल, चतुर्दल, षड्दल, दशदल, द्वादशदल अथवा षोडशदल कमलके आसनपर विराजमान शिवका विधिवत् स्मरण करना चाहिये। दोनों भौंहोंके मध्यभागमें द्विदल कमल है, जो विद्युत्के समान प्रकाशमान है। भ्रूमध्यमें स्थित जो कमल है, उसके क्रमशः दक्षिण और उत्तर भागमें दो पत्ते हैं, जो विद्युत्के समान दीप्तिमान् हैं। उनमें दो अन्तिम वर्ण 'ह' और 'क्ष' अंकित हैं। षोडशदल कमलके पत्ते सोलह स्वररूप हैं, जिनमें 'अ' से लेकर 'अः' तकके अक्षर क्रमशः अंकित हैं। यह जो कमल है, उसकी नालके मूलभागसे बारह दल प्रस्फुटित हुए हैं, जिनमें 'क' से लेकर 'ठ' तकके बारह अक्षर क्रमशः अंकित हैं। सूर्यके समान प्रकाशमान इस कमलके उन द्वादश दलोंका अपने हृदयके भीतर ध्यान करना चाहिये। तत्पश्चात् गो-दुग्धके समान उज्ज्वल कमलके दस दलोंका चिन्तन करे। उनमें क्रमशः 'ड' से लेकर 'फ' तकके अक्षर अंकित हैं। इसके बाद नीचेकी ओर दलवाले कमलके छः दल हैं, जिनमें 'ब' से लेकर 'ल' तकके अक्षर अंकित हैं। इस कमलकी कान्ति धूमरहित अंगारके समान है। मूलाधारमें स्थित जो कमल है, उसकी