भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८२४ * संक्षिप्त शिवपुराण *


केवल—निर्गुण-निराकार ब्रह्ममें ही प्रवृत्त होती है।

अतः सविषय ध्यान प्रातःकालके सूर्यकी किरणोंके समान ज्योतिका आश्रय लेनेवाला है। तथा निर्विषय ध्यान सूक्ष्मतत्त्वका अवलम्बन करनेवाला है। इन दोके सिवा और कोई ध्यान वास्तवमें नहीं है। अथवा सविषय ध्यान साकार स्वरूपका अवलम्बन करनेवाला है तथा निराकार स्वरूपका जो बोध या अनुभव है, वही निर्विषय ध्यान माना गया है। वह सविषय और निर्विषय ध्यान ही क्रमशः सबीज और निर्बीज कहा जाता है। निराकारका आश्रय लेनेसे उसे निर्बीज और साकारका आश्रय लेनेसे सबीजकी संज्ञा दी गयी है। अतः पहले सविषय या सबीज ध्यान करके अन्तमें सब प्रकारकी सिद्धिके लिये निर्विषय अथवा निर्बीज ध्यान करना चाहिये। प्राणायाम करनेसे क्रमशः शान्ति आदि दिव्य सिद्धियाँ सिद्ध होती हैं। उनके नाम हैं—शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति और प्रसाद। समस्त आपदाओंके शमनको ही शान्ति कहा गया है। तम (अज्ञान)-का बाहर और भीतरसे नाश ही प्रशान्ति है। बाहर और भीतर जो ज्ञानका प्रकाश होता है, उसका नाम दीप्ति है तथा बुद्धिकी जो स्वस्थता (आत्मनिष्ठता) है, उसीको प्रसाद कहा गया है। बाह्य और आभ्यन्तरसहित जो समस्त करण हैं, वे बुद्धिके प्रसादसे शीघ्र ही प्रसन्न (निर्मल) हो जाते हैं।

ध्याता, ध्यान, ध्येय और ध्यान-प्रयोजन—इन चारको जानकर ध्यान करनेवाला पुरुष ध्यान करे। जो ज्ञान और वैराग्यसे सम्पन्न हो, सदा शान्तचित्त रहता हो, श्रद्धालु हो और जिसकी बुद्धि प्रसादगुणसे युक्त हो, ऐसे साधकको ही सत्पुरुषोंने ध्याता कहा है। 'ध्यै चिन्तायाम्' यह धातु है। इसका अर्थ है चिन्तन। भगवान् शिवका बारंबार चिन्तन ही ध्यान कहलाता है। जैसे थोड़ा-सा भी योगाभ्यास पापका नाश कर देता है, उसी तरह क्षणमात्र भी ध्यान करनेवाले पुरुषके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। श्रद्धापूर्वक, विक्षेपरहित चित्तसे परमेश्वरका जो चिन्तन है, उसीका नाम 'ध्यान' है। बुद्धिके प्रवाहरूप ध्यानका जो आलम्बन या आश्रय है, उसीको साधु पुरुष 'ध्येय' कहते हैं। स्वयं साम्ब सदाशिव ही वह ध्येय हैं। मोक्ष-सुखका पूर्ण अनुभव और अणिमा आदि ऐश्वर्यकी उपलब्धि—ये पूर्ण शिवध्यानके साक्षात् प्रयोजन कहे गये हैं। ध्यानसे सौख्य और मोक्ष दोनोंकी प्राप्ति होती है, इसलिये मनुष्यको सब कुछ छोड़कर ध्यानमें लग जाना चाहिये। बिना ध्यानके ज्ञान नहीं होता और जिसने योगका साधन नहीं किया है, उसका ध्यान नहीं सिद्ध होता। जिसे ध्यान और ज्ञान दोनों प्राप्त हैं, उसने भवसागरको पार कर लिया। समस्त उपाधियोंसे रहित, निर्मल ज्ञान और एकाग्रतापूर्ण ध्यान—ये योगाभ्याससे युक्त योगीको ही सिद्ध होते हैं। जिनके सारे पाप नष्ट हो गये हैं, उन्हींकी बुद्धि ज्ञान और ध्यानमें लगती है। जिनकी बुद्धि पापसे दूषित है, उनके लिये ज्ञान और ध्यानकी बात भी अत्यन्त दुर्लभ है। जैसे प्रज्वलित हुई आग सूखी और गीली लकड़ीको भी जला देती है, उसी प्रकार ध्यानाग्नि शुभ और अशुभ कर्मको भी क्षणभरमें दग्ध कर देती है। जैसे बहुत छोटा दीपक भी महान्