शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
८३२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
कलिकालके आनेसे काशीके आसपास निवास करने लगे। तदनन्तर पशु-पाशसे छूटनेकी इच्छासे उन सबने पूर्णतया पाशुपत-व्रतका अनुष्ठान किया और सम्पूर्ण बोध एवं समाधिपर अधिकार करके वे अनिन्द्य महर्षि परमानन्दको प्राप्त हो गये।
व्यास उवाच
एतच्छिवपुराणं हि समाप्तं हितमादरात्।
पठितव्यं प्रयत्नेन श्रोतव्यं च तथैव हि॥
नास्तिकाय न वक्तव्यमश्रद्धाय शठाय च।
अभक्ताय महेशस्य तथा धर्मध्वजाय च॥
एतच्छ्रुत्वा ह्येकवारं भवेत् पापं हि भस्मसात्।
अभक्तो भक्तिमाप्नोति भक्तो भक्तिसमृद्धिभाक्॥
पुनः श्रुते च सद्भक्तिर्मुक्तिः स्याच्च श्रुते पुनः।
तस्मात् पुनः पुनश्चैव श्रोतव्यं हि मुमुक्षुभिः॥
पञ्चावृत्तिः प्रकर्तव्या पुराणस्यास्य सद्धिया।
परं फलं समुद्दिश्य तत्राप्नोति न संशयः॥
पुरातनाश्च राजानो विप्रा वैश्याश्च सत्तमाः।
सप्तकृत्वस्तदावृत्त्यालभन्त शिवदर्शनम्॥
श्रोष्यत्यथापि यश्चेदं मानवो भक्तितत्परः।
इह भुक्त्वाखिलान् भोगानन्ते मुक्तिं लभेच्च सः॥
एतच्छिवपुराणं हि शिवस्यातिप्रियं परम्।
भुक्तिमुक्तिप्रदं ब्रह्मसम्मितं भक्तिवर्धनम्॥
एतच्छिवपुराणस्य वक्तुः श्रोतुश्च सर्वदा।
सगणः ससुतः साम्बः शं करोतु स शङ्करः॥
(शि० पु०, वा० सं०, उ० ख० ४१।४३—५१)
व्यासजी कहते हैं—यह शिवपुराण पूरा हुआ, इस हितकर पुराणको बड़े आदर एवं प्रयत्नसे पढ़ना तथा सुनना चाहिये। नास्तिक, श्रद्धाहीन, शठ, महेश्वरके प्रति भक्तिसे रहित तथा धर्मध्वजी (पाखण्डी)-को इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। इसका एक बार श्रवण करनेसे ही सारा पाप भस्म हो जाता है। भक्तिहीन भक्ति पाता है और भक्त भक्तिकी समृद्धिका भागी होता है। दोबारा श्रवण करनेपर उत्तम भक्ति और तीसरी बार सुननेपर मुक्ति सुलभ हो जाती है, इसलिये मुमुक्षु पुरुषोंको बारंबार इसका श्रवण करना चाहिये। किसी भी उत्तम फलको पानेके लिये शुद्ध-बुद्धिसे इस पुराणकी पाँच आवृत्ति करनी चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्य उस फलको प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। प्राचीन कालके राजाओं, ब्राह्मणों तथा श्रेष्ठ वैश्योंने इसकी सात आवृत्ति करके शिवका साक्षात् दर्शन प्राप्त किया है। जो मनुष्य भक्तिपरायण हो इसका श्रवण करेगा, वह भी इहलोकमें सम्पूर्ण भोगोंका उपभोग करके अन्तमें मोक्ष प्राप्त कर लेगा। यह श्रेष्ठ शिवपुराण भगवान् शिवको अत्यन्त प्रिय है। यह वेदके तुल्य माननीय, भोग और मोक्ष देनेवाला तथा भक्तिभावको बढ़ानेवाला है। अपने प्रमथगणों, दोनों पुत्रों तथा देवी पार्वतीजीके साथ भगवान् शंकर इस पुराणके वक्ता और श्रोताका सदा कल्याण करें।
(अध्याय ४१)
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॥ वायवीयसंहिता सम्पूर्ण ॥
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॥ शिवपुराण सम्पूर्ण ॥
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
(चित्र: पञ्चमुखी शिव)
गीताप्रेस, गोरखपुर
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शि ॐ नमः शिवाय ॐ नम ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शि ॐ नमः ॐ नमः ॐ नमः ॐ नमः ॐ नमः ॐ नमः शि ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ ॐ नमः शिवाय ॐ नमः ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाया ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शि ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शि... ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शि... ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शि... ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शि... ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शि... ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शि... ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शि... ॐ नमः शि... ॐ नमः शि... ॐ शि...
...मः शि ॐ नमः शि वाय ॐ नमः शि नमः शिवाय ॐ नमः शि शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शि शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शि ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शि ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शि ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शि ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शि
॥ श्रीहरिः ॥
गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित— 'पुराण'
मूल संस्कृत एवं हिन्दी-अनुवाद
| कोड | ग्रन्थ नाम | टिप्पणी |
|---|---|---|
| 26 <br> 27 | श्रीमद्भागवतमहापुराण <br> (दो खण्डोंमें) | <br> (अंग्रेजीमें भी) |
| 728 | महाभारत (छः खण्डोंमें) | (अलगसे हिन्दीमें भी) |
| 38 | महाभारत-खिलभाग-हरिवंशपुराण | |
| 48 | श्रीश्रीविष्णुपुराण | (अलगसे हिन्दीमें भी) |
| 637 | श्रीजैमिनीय अश्वमेध पर्व | |
| 1113 | श्रीनरसिंहपुराण | |
| 1432 | श्रीवामनपुराण |
केवल हिन्दी
789 सं० शिवपुराण (गुजरातीमें भी)
1133 सं० देवीभागवत (गुजरातीमें भी)
| कोड | ग्रन्थ नाम | कोड | ग्रन्थ नाम | |
|---|---|---|---|---|
| 44 | सं० पद्मपुराण | 279 | सं० स्कन्दपुराणाङ्क | |
| 1183 | सं० नारदपुराण | 1189 | सं० गरुडपुराणाङ्क | |
| 539 | सं० मार्कण्डेयपुराण | 584 | सं० भविष्यपुराणाङ्क | |
| 631 | सं० ब्रह्मवैवर्तपुराण | 517 | गर्गसंहिता | |
| 1111 | सं० ब्रह्मपुराण | 1362 | सं० अग्निपुराण | |
| 1361 | सं० श्रीवराहपुराण |
GPPN 1468
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