शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थपटलः । ( ९७ ) रीम् ॥ ब्रह्मरन्ध्रमुखे सुप्तां मुद्राभ्यासं स माचरेत् ॥ २३ ॥ टीका-इसकारणसे यत्नपूर्वक ब्रह्मरन्ध्रके मुखमें जो ईश्वरी कुण्डलिनी देवी शयन करती हैं उनको उठानेके अर्थ मुद्राका अभ्यास उचित है ॥ २३ ॥ मूलम्-महामुद्रा महाबन्धो महावेधश्च खे- चरी ॥ जालंधरो मूलबंधो विपरीतकृति- स्तथा ॥२४॥ उड्डानं चैव वज्रोली दशमे शक्तिचालनम् ॥ इदं हि मुद्रादशकं मुद्रा णामुत्तमोत्तमम् ॥ २५ ॥ टीका-अब उत्तम मुद्राबन्ध वेध कहते हैं महामुद्रा, महाबन्ध, महावेध, खेचरीमुद्रा, जालन्धरबन्ध, मूल- बन्ध, विपरीतकरणीमुद्रा, उड्डानबन्ध, वज्रोलीमुद्रा और दशवीं शक्तिचालनमुद्रा, यह दशों मुद्रा सबमें अतिउत्तम हैं ॥ २४ ॥ २५ ॥ अथ महामुद्राकथनम् । मूलम्-महामुद्रां प्रवक्ष्यामि तन्त्रेऽस्मिन्म- मवल्लभे ॥ यां प्राप्य सिद्धाः सिद्धिं च कपिलाद्याः पुरा·गताः ॥ २६ ॥ ५