भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

चतुर्थपटलः । ( १०३ ) मूलम्-वेधेनानेन संविध्य वायुनायोगिपुंग- वः ॥ ग्रंथिं सुषुम्णामार्गेण ब्रह्मग्रंथिं भि- नत्त्यसौ ॥ ४४ ॥ टीका-बुद्धिमान् योगी इस वेधद्वारा वायुसे सर्व ग्रन्थीको वेधन करके सुषुम्नारन्ध्रद्वारा ब्रह्मग्रंथीको भेदन करताहै ॥ ४४ ॥ मूलम्-यःकरोति सदाभ्यासं महावेधं सुगो- पितम् ॥ वायुसिद्धिर्भवेत्तस्य जरामरण नाशिनी ॥ ४५ ॥ टीका-जो मनुष्य इस उत्तम महावेधको गोपित करके सर्वदा अभ्यास करेगा उसकी जरामरण नाशि- नी वायुसिद्धि होजायगी ॥ ४५ ॥ मूलम्-चक्रमध्ये स्थिता देवाः कम्पन्ति वायुताडनात् ॥ कुण्डल्यपि महामाया कैलासे सा विलीयते ॥ ४६ ॥ टीका-शरीरस्थ चक्रमें जो देवता हैं वह वायुके ताडनसे कम्पायमान होते हैं और महामाया कुण्डलि- नी देवी कैलास अर्थात् ब्रह्मस्थानमें लय होती है तात्प- र्य यह है कि, चक्रस्थित देवता अर्थात् गणेशजी, ब्रह्मा, विष्णु, महादेवजी, मायाधीश ज्योतिस्वरूप ईश्वर क्रमसे