शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थपटलः । ( १०५ ) टीका-यह तीनोंके माहात्म्यको सिद्धलोक जानते हैं इतरलोग अर्थात् सांसारिक मनुष्य नहीं जानते इसके जानलेनेसे साधकलोगोंको सर्वसिद्धिलाभ होती है ॥४९॥ मूलम्--गोपनीया प्रयत्नेन साधकैः सिद्धि- मीप्सुभिः ॥ अन्यथा च न सिद्धिः स्यान्मुद्राणामेष निश्चयः ॥ ५० ॥ टीका-सिद्धाकांक्षी साधकको उचित है कि, यह सब मुद्राको यत्नपूर्वक गोप्य रक्खे इनको प्रकाश करनेसे कदापि सिद्धि नहोगी यह निश्चय है ॥ ५० ॥ अथ खेचरीमुद्राकथनम् । मूलम्-भ्रुवोरन्तर्गतां दृष्टिं विधाय सुदृढां सुधीः ॥ ५१ ॥ उपविश्यासने वज्रे नानो- पद्रववर्जितः ॥ लम्बिकोर्ध्वं स्थिते गर्ते रसनां विपरीतगाम् ॥ ५२ ॥ संयोजये- त्प्रयत्नेन सुधाकूपे विचक्षणः ॥ मुद्रैषा खेचरी प्रोक्ता भक्तानामनुरोधतः ॥५३॥ टीका-बुद्धिमान् साधक दोनों भ्रू अर्थात् भ्रुकुटी- के मध्यमें दृढ करके दृष्टिको स्थिर करके और नाना- उपद्रवरहित होके वज्रासन अर्थात् सिद्धासनसे स्थित होयके जिह्वाको विपरीत अर्थात् ऊपर सुधाकूप स्वरूप