शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमता । टीका-निश्चय जिसके जाननेसे सब संसार जाना जाता है ऐसे योगशास्त्रके जाननेमें परिश्रम करना अवश्य उ- चितहै फिर अन्य शास्त्र जो कहेहैं उनका क्या प्रयोजन है अर्थात् कुछ प्रयोजन नहीं तात्पर्य यह है कि, पंडित लोग वृथा विवाद करके जो लोग सुमार्गमें जानेकी इच्छा करतेहैं उनको भी भ्रष्ट कर देते हैं ॥ १८ ॥ मूलम्-योगशास्त्रमिदं गोप्यमस्माभिः परि- भाषितम् ॥ सुभक्ताय प्रदातव्यं त्रैलोक्ये च महात्मने ॥ १९ ॥ टीका-यह योगशास्त्र जो हमने कहाहै सो परम गोपनीय है यह त्रैलोक्यमें महात्मा और अच्छे भक्त जनोंको दे- ना उचित है तात्पर्य यह है कि, विना ईश्वर- के भक्तिके यह शुभकर्म सिद्ध नहीं होता न उधर चित्तकी वृत्ति जातीहै इस हेतुसे अभक्तजनोंको देना उचित नहींहै ॥ १९ ॥ मूलम्-कर्मकाण्डं ज्ञानकाण्डमिति वेदो द्वि- धा मतः ॥ भवति द्विविधो भेदो ज्ञानका- ण्डस्य कर्मणः ॥ २० ॥ द्विविधः कर्म काण्डः स्यान्निषेधविधिपूर्वकः ॥ निषिद्ध- कर्मकरणे पापं भवति निश्चितम् ॥ विधि- .