भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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( ११८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । कारण है और मूढलोगोंके मूढताका और जरामरण शील लोगोंका अर्थात् सबका यही विन्दु हेतु है योगी लोगोंके प्रति यह हमारा उत्तम योग है ॥ ९१ ॥ ९२ ॥ मूलम्-अभ्यासात्सिद्धिमाप्नोति भोगयु- क्तोऽपि मानवः ॥ सकलः साधितार्थोपि सिद्धो भवति भूतले ॥ ९३ ॥ टीका-भोगयुक्त मनुष्योंकोभी अभ्याससे सिद्धि प्राप्त होतीहै और सकल वाञ्छितफल संसारमें सिद्ध होजाते हैं ॥ ९३ ॥ मूलम्-भुक्त्वा भोगानशेषान् वै योगेनानेन निश्चितम् ॥ अनेन सकला सिद्धिर्योगिनां भवति ध्रुवम् ॥ सुखभोगेन महता तस्मा- देनं समभ्यसेत् ॥ ९४ ॥ टीका-इस योगअभ्यासद्वारा निश्चय अशेषभोग भोगनेसे सुखी होगा और योगीलोगोंको इस वज्रो- लीमुद्रासे सकल सिद्धी अवश्य प्राप्तहोती हैं और महानसुख भोगते हुए यह साधना सिद्ध होगी इसलि- ये इसका अभ्यास करना उचित है ॥ ९४ ॥ मूलम्-सहजोल्यमरोली च वज्रोल्या भेद- तो भवेत् ॥ येन केन प्रकारेण बिन्दुं योगी प्रधारयेत् ॥ ९५ ॥