शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-योगग्रहणके समय बुद्धिमान् साधक ब्राह्म- णको सन्तोष करके अर्थात् द्रव्यादिक प्रदानपूर्वक प्रसन्न करके अनेक आशीर्वाद श्रवण करके पवित्रता से शिवमन्दिरमें बैठके आत्माके अर्थ जो यह शुभयोग है इसको ग्रहणकरे ॥ ५२ ॥ मूलम्-संन्यस्यानेन विधिना प्राक्तनं विग्रहादिकम् ॥ भूत्वा दिव्यवपुर्योगी गृह्णीयाद्वक्ष्यमाणकम् ॥ ५३ ॥ टीका-साधक इस विधानसे पूर्व शरीर गुरुकी कृ- पासे त्यागके दिव्य शरीर होके जो आगे कहेंगे वह योग ग्रहण करे. तात्पर्य यह है कि, योगग्रहणके समयसे साधकका शरीर दिव्य होजाताहै व्याधि और अज्ञान- का शरीर नहीं रहजाता इस हेतुसे योगग्रहणके समय साधक यह चिंतनकरे कि, पूर्व शरीरको हमने त्यागके दिव्यशरीर धारण किया ॥ ५३ ॥ मूलम्-पद्मासनस्थितो योगी जनसंगविव- र्जितः ॥ विज्ञाननाडीद्वितयमङ्गुलीभ्यां निरोधयेत् ॥ ५४ ॥ टीका-योगी संगरहित पद्मासनमें स्थित होके दो- नों विज्ञाननाडी अर्थात् इडा और पिंगलाको दो अंगु- लीसे निरोध करे ॥ ५४ ॥