शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचमपटलः । (१४३) टीका-पद्मासनस्थित योगी जब कण्ठकूपका स्मरण अर्थात् उस स्थानमें मनको लय करके जिह्वा- को तालुमूलमें स्थित करेगा तब क्षुधा और पिपासा- से रहित हो जायगा ॥ ६१ ॥ मूलम्-कण्ठकूपादधः स्थाने कूर्मनाड्य- स्ति शोभना॥ तस्मिन् योगी मनो दत्त्वा चित्तस्थैर्यं लभेदृशम् ॥ ६२ ॥ टीका-कंठकूपके नीचे कूर्मनाडी शोभित है उस नाडीमें योगी मनको स्थिर करके अत्यंत चित्तकी स्थिरता पावेगा ॥ ६२ ॥ मूलम्-शिरःकपाले रुद्राक्षं विवरं चिन्तये- द्यदा ॥ तदा ज्योतिःप्रकाशः स्याद्विद्युत्पु- ञ्जसमप्रभः ॥६३॥ एतच्चिन्तनमात्रेण पा- पानां संक्षयो भवेत् ॥ दुराचारोऽपि पुरुषो लभते परमं पदम् ॥ ६४ ॥ टीका--शिर कपालमें जो रुद्राक्ष विवर है उसमें यदि चिंतना करे तो विद्युत्पुञ्जके समान आत्मज्यो- तिका प्रकाश होगा और इसके चिन्तनमात्रसे योगीका सर्व पाप् नष्ट होजायगा. यदि दुराचारमेंभी जो पुरुष आसक्त है वहभी परमगतिको प्राप्त होगा ॥६३॥ ६४॥