शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचमपटलः । ( १६५ ) र्शी ऋषिलोगोंने अनेक शास्त्रोंमें बहुत प्रकारसे परम- तत्त्व कहाहै ॥ १३४ ॥ मूलम्-सुषुम्णा मेरुणा याता ब्रह्मरन्ध्रं य- तोऽस्ति वै ॥ ततश्चैषा परावृत्त्य तदाज्ञा- पद्मदक्षिणे ॥ १३५ ॥ वामनासापुटं या- ति गंगेति परिगीयते ॥ १३६ ॥ टीका-सुषुम्नानाडी मेरुदंडद्वारा जहां ब्रह्मरन्ध्र है उस स्थानमें गई है और इडानाडी मेरुतक जायके लौटीहै और आज्ञाचक्रके दक्षिणभाग होके वामनासापु- टको गई है इसको गङ्गा कहतेहैं ॥ १३५ ॥ १३६ ॥ मूलम्--ब्रह्मरन्ध्रे हि यत्पद्मं सहस्रारं व्यव- स्थितम्॥तत्र कन्देहि या योनिस्तस्यां च- न्द्रो व्यवस्थितः ॥१३७॥ त्रिकोणाकार- तस्तस्याः सुधा क्षरति सन्ततम्॥इडाया- ममृतं तत्र समं स्रवति चन्द्रमाः॥१३८॥ अमृतं वहति द्वारा धारारूपं निरन्तरम् ॥ वामनासापुटं याति गंगेत्युक्ता हि यो- गिभिः ॥ १३९ ॥ टीका-ब्रह्मरन्ध्रमें जो सहस्रदल पद्म है उस पद्मके कन्दमें योनि है उस योनिमें चन्द्रमा विराजमान है