शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । भवेत्सर्वं नात्र कार्या विचारणा ॥ १९३ ॥ सन्तताभ्यासयोगेन सिद्धो भवति मा- नवः॥ सत्यं सत्यं पुनः सत्यं मम तुल्यो भवेद्ध्रुवम् ॥ योगशास्त्रं च परमं योगिनां सिद्धिदायकम् ॥ १९४ ॥ टीका-शिरःस्थचन्द्रमाका ध्यान करनेसे सर्व ग्रह अनुकूल होजाते हैं और समस्त उपद्रवका नाश होजा- ताहै और उपसर्ग प्रशमित होते हैं और युद्धमें जय लाभ होता है और खेचरी भूचरीकी सिद्धि प्राप्त होती है इसमें सन्देह नहीं है और निरन्तर यह योगाभ्यास करनेसे अवश्य साधक सिद्ध होजाता है हे पार्वती ! हम सत्य सत्य वारंवार कहते हैं कि हमारे तुल्य होजाय- गा इसमें सन्देह नहीं है यह परमयोग योगीलोगोंके सिद्धिका दाता है ॥ १९२ ॥ १९३ ॥ १९४ ॥ अथ राजयोगकथनम् । मूलम्-अत ऊर्ध्वं दिव्यरूपं सहस्रारं सरोरु- हम् ॥ ब्रह्माण्डाख्यस्य देहस्य बाह्ये तिष्ठति मुक्तिदम् ॥१९५ ॥ कैलासो नाम तस्यैव महेशो यत्र तिष्ठति॥अकुलाख्योऽ- विनाशी च क्षयवृद्धिविवर्जितः ॥ १९६ ॥