शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १९० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेत । रता है सो मुक्त है इसमें संशय नहीं है और निश्चय वही योगी सद्भक्त है और सर्वलोकमें पूजनीय है २१७॥२१८॥ मूलम्-अहमस्मीति यन्मत्वा जीवात्मपर- मात्मनोः॥अहं त्वमेतदुभयं त्यक्त्वाखण्डं विचिन्तयेत् ॥२१९॥ अध्यारोपापवादा- भ्यां यत्र सर्वं विलीयते ॥ तद्बीजमाश्रये- द्योगी सर्वसंगविवर्जितः ॥ २२० ॥ टीका-योगी अपनेको और जीवात्मा और परमा- त्माको तुल्य माने अर्थात् भेदरहित होजाय और हम और तुम यह दोनों भावको त्यागके एक अखण्ड ब्रह्मका चिन्तन करे अध्यारोपअपवादद्वारा जिसमें सर्व वस्तुका लय होजाता है योगी सर्वसङ्गसे रहित होके उसी बीजके आश्रय होजाय अर्थात् चित्तवृत्ति- को आत्मामें लय करदे ॥ २१९ ॥ २२० ॥ मूलम्-अपरोक्षं चिदानन्दं पूर्णं त्यक्त्वा भ्र- माकुलाः ॥ परोक्षं चापरोक्षं च कृत्वा मूढा भ्रमन्ति वै ॥ २२१ ॥ टीका-मूढबुद्धिके मनुष्य अपरोक्ष अर्थात् प्रत्यक्ष परि- पूर्णब्रह्मको छोड करके भ्रममें पडके परोक्ष और अप- रोक्षका रात्रि दिवस निर्णय करते फिरते हैं ॥ २२१ ॥