शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(६०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेत । टीका-योगसिद्धि होनेका प्रथम लक्षण यह है कि, उसके सिद्धिमें विश्वास हो दूसरे श्रद्धायुक्त तीसरे गुरु- पूजारत हो चौथे प्राणीमात्रमें समताभाव रक्खे पांचवें इन्द्रियोंका निग्रह रहे छठवें परिमित भोजन करै यह छः लक्षण योगसिद्धिके हैं और सातवाँ नहीं है ॥१९॥२०॥ मूलम्-योगोपदेशं संप्राप्य लब्ध्वा योग विदं गुरुम् ॥ गुरूपदिष्टविधिना धिया निश्चित्य साधयेत् ॥ २१ ॥ टीका-योगवेत्ता गुरुसे योग उपदेश लेके जिस विधिसे गुरु उपदेश करे उस विधिसे बुद्धि निश्चय क रके साधन करे ॥ २१ ॥ मूलम्-सुशोभने मठे योगी पद्मासनसम- न्वितः ॥ आसनोपरि संविश्य पवनाभ्या- समाचरेत् ॥ २२ ॥ टीका-उपद्रवरहित सुन्दर स्वच्छ और उसका सू- क्ष्म रन्ध्र होय उस मठमें पद्मासनसंयुक्त आसनपर बैठके योगी पवनका अभ्यास करे ॥ २२ ॥ मूलम्-समकायः प्राञ्जलिंश्च प्रणम्य च गुरून् सुधीः॥दक्षे वामे च विघ्नेशं क्षेत्रपा- लांबिकां पुनः ॥ २३ ॥